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Rigveda Mandal 4 / Sukta 21 / Mantra 5

58 Sukta
11 Mantra
4/21/5
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उप॒ यो नमो॒ नम॑सि स्तभा॒यन्निय॑र्ति॒ वाचं॑ ज॒नय॒न्यज॑ध्यै। ऋ॒ञ्ज॒सा॒नः पु॑रु॒वार॑ उ॒क्थैरेन्द्रं॑ कृण्वीत॒ सद॑नेषु॒ होता॑ ॥५॥

उप॑ । यः । नमः॑ । नम॑सि । स्त॒भा॒यन् । इय॑र्ति । वाच॑म् । ज॒नय॑न् । यज॑ध्यै । ऋ॒ञ्ज॒सा॒नः । पु॒रु॒ऽवारः॑ । उ॒क्थैः । आ । इन्द्र॑म् । कृ॒ण्वी॒त॒ । सद॑नेषु । होता॑ ॥

Mantra without Swara
उप यो नमो नमसि स्तभायन्नियर्ति वाचं जनयन्यजध्यै। ऋञ्जसानः पुरुवार उक्थैरेन्द्रं कृण्वीत सदनेषु होता ॥

उप। यः। नमः। नमसि। स्तभायन्। इयर्ति। वाचम्। जनयन्। यजध्यै। ऋञ्जसानः। पुरुऽवारः। उक्थैः। आ। इन्द्रम्। कृण्वीत। सदनेषु। होता ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 5 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (यजध्यै) मेल करने को (वाचम्) उत्तम शिक्षायुक्त वाणी (जनयन्) प्रकट करता हुआ (उक्थैः) प्रशंसित कर्म्मों से (ऋञ्जसानः) अत्यन्त सिद्ध करता हुआ (पुरुवारः) बहुतों से स्वीकार किया गया (होता) न्याय को देनेवाला (सदनेषु) न्याय के स्थानों में (नमसि) अन्न वा सत्कार के निमित्त (नमः) अन्न को (उप, स्तभायन्) स्तम्भित अर्थात् रोकता हुआ (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्य को (आ, कृण्वीत) सिद्ध करे, वह अन्न और सत्कार को (इयर्त्ति) प्राप्त होता है ॥५॥
Essence
जो राजा विद्या और उत्तम शिक्षा से युक्त नीति को प्रकट करता, सत्कार करने के योग्यों का सत्कार करता, दुष्टों को दण्ड देता और प्रयत्न करता हुआ राज्य के पालन से ऐश्वर्य्य की उन्नति करता है, वही सर्वत्र सत्कृत होता है ॥५॥
Subject
फिर उसी राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥