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Rigveda Mandal 4 / Sukta 21 / Mantra 4

58 Sukta
11 Mantra
4/21/4
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स्थू॒रस्य॑ रा॒यो बृ॑ह॒तो य ईशे॒ तमु॑ ष्टवाम वि॒दथे॒ष्विन्द्र॑म्। यो वा॒युना॒ जय॑ति॒ गोम॑तीषु॒ प्र धृ॑ष्णु॒या नय॑ति॒ वस्यो॒ अच्छ॑ ॥४॥

स्थू॒रस्य॑ । रा॒यः । बृ॒ह॒तः । यः । ईशे॑ । तम् । ऊँ॒ इति॑ । स्त॒वा॒म॒ । वि॒दथे॑षु । इन्द्र॑म् । यः । वा॒युना॑ । जय॑ति । गोऽम॑तीषु । प्र । धृ॒ष्णु॒ऽया । नय॑ति । वस्यः॑ । अच्छ॑ ॥

Mantra without Swara
स्थूरस्य रायो बृहतो य ईशे तमु ष्टवाम विदथेष्विन्द्रम्। यो वायुना जयति गोमतीषु प्र धृष्णुया नयति वस्यो अच्छ ॥

स्थूरस्य। रायः। बृहतः। यः। ईशे। तम्। ऊम् इति। स्तवाम। विदथेषु। इन्द्रम्। यः। वायुना। जयति। गोऽमतीषु। प्र। धृष्णुऽया। नयति। वस्यः। अच्छ ॥४॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 5 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (बृहतः) बड़े (स्थूरस्य) स्थूल (रायः) धन का (ईशे) स्वामी होता है (विदथेषु) सङ्ग्रामों में (इन्द्रम्) शत्रु के नाश करनेवाले को (अच्छ) उत्तम प्रकार (नयति) प्राप्त करता है (यः) जो (गोमतीषु) प्रशंसित वाणियों से युक्त सेनाओं में (धृष्णुया) प्रगल्भता और (वायुना) पवन के साथ उत्तम प्रकार (जयति) विजयी होता है (वस्यः) अत्यन्त श्रेष्ठ धन को (प्र) प्रीति के साथ चाहता है (तम्, उ) उसी की हम लोग (स्तवाम) प्रशंसा करें ॥४॥
Essence
जो राजा बड़ी सेनाओं से सङ्ग्रामों में विजय को प्राप्त हो तथा बहुत धनों और प्रतिष्ठा को प्राप्त होकर प्रशंसित होता है, उसी की स्तुति करनी चाहिये ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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