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Rigveda Mandal 4 / Sukta 21 / Mantra 3

58 Sukta
11 Mantra
4/21/3
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ या॒त्विन्द्रो॑ दि॒व आ पृ॑थि॒व्या म॒क्षू स॑मु॒द्रादु॒त वा॒ पुरी॑षात्। स्व॑र्णरा॒दव॑से नो म॒रुत्वा॑न्परा॒वतो॑ वा॒ सद॑नादृ॒तस्य॑ ॥३॥

आ । या॒तु॒ । इन्द्रः॑ । दि॒वः । आ । पृ॒थि॒व्याः । म॒क्षु । स॒मु॒द्रात् । उ॒त । वा॒ । पुरी॑षात् । स्वः॑ऽनरात् । अव॑से । नः॒ । म॒रुत्वा॑न् । प॒रा॒ऽवतः॑ । वा॒ । सद॑नात् । ऋ॒तस्य॑ ॥

Mantra without Swara
आ यात्विन्द्रो दिव आ पृथिव्या मक्षू समुद्रादुत वा पुरीषात्। स्वर्णरादवसे नो मरुत्वान्परावतो वा सदनादृतस्य ॥

आ। यातु। इन्द्रः। दिवः। आ। पृथिव्याः। मक्षु। समुद्रात्। उत। वा। पुरीषात्। स्वःऽनरात्। अवसे। नः। मरुत्वान्। पराऽवतः। वा। सदनात्। ऋतस्य ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 5 Mantra » 3

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Meaning
जैसे सूर्य (आ, दिवः) प्रकाश से (पृथिव्याः) भूमि से (उत) और (समुद्रात्) अन्तरिक्ष से (वा) वा (पुरीषात्) जल से (परावतः) दूर देश से (ऋतस्य) सत्य कारण के (सदनात्) स्थान से (वा) वा हम संसारी जनों की रक्षा आदि के लिये (मक्षू) शीघ्र प्राप्त होता है, वैसे ही (स्वर्णरात्) सूर्य्य के सदृश नायक से (नः) हम लोगों के (अवसे) रक्षण आदि के लिये (मरुत्वान्) वायुवान् पदार्थ के सदृश प्रशंसित पुरुषों से युक्त होता हुआ (इन्द्रः) सूर्य के समान राजा (आ, यातु) प्राप्त हो ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् ! जैसे सूर्य्य अन्तरिक्ष, प्रकाश, भूमि, जल और कार्य्य जगत् को व्याप्त होकर सब की रक्षा करता है, वैसे ही प्रतापी और उत्तम सहाययुक्त होकर और हम लोग की उत्तम प्रकार रक्षा करके प्रकाशित हूजिये ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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