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Rigveda Mandal 4 / Sukta 20 / Mantra 7

58 Sukta
11 Mantra
4/20/7
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
न यस्य॑ व॒र्ता ज॒नुषा॒ न्वस्ति॒ न राध॑स आमरी॒ता म॒घस्य॑। उ॒द्वा॒वृ॒षा॒णस्त॑विषीव उग्रा॒स्मभ्यं॑ दद्धि पुरुहूत रा॒यः ॥७॥

न । यस्य॑ । व॒र्ता । ज॒नुषा॑ । नु । अस्ति॑ । न । राध॑सः । आ॒ऽम॒री॒ता । म॒घस्य॑ । उ॒त्ऽव॒वृ॒षा॒णः । त॒वि॒षी॒ऽवः॒ । उ॒ग्र॒ । अ॒स्मभ्य॑म् । द॒द्धि॒ । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । रा॒यः ॥

Mantra without Swara
न यस्य वर्ता जनुषा न्वस्ति न राधस आमरीता मघस्य। उद्वावृषाणस्तविषीव उग्रास्मभ्यं दद्धि पुरुहूत रायः ॥

न। यस्य। वर्ता। जनुषा। नु। अस्ति। न। राधसः। आऽमरीता। मघस्य। उत्ऽववृषाणः। तविषीऽवः। उग्र। अस्मभ्यम्। दद्धि। पुरुऽहूत। रायः। ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 4 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पुरुहूत) बहुतों के पुकारनेवाले (उग्र) प्रतापी राजन् (यस्य) जिसका (जनुषा) जन्म से (वर्त्ता) निवारण करनेवाला कोई भी (न) नहीं (अस्ति) है जिसके (मघस्य) धन और (राधसः) धनरूप अन्न का (आमरीता) सब प्रकार नाश करनेवाला (न) नहीं विद्यमान है। हे (उद्वावृषाणः) उत्तमता से अत्यन्त बल करनेवाले की (तविषीवः) बलयुक्त सेनावान् जीतनेवाला वह आप (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (रायः) धनों को (नु) निश्चय से (दद्धि) दीजिये ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जिसका उत्तम कुल में जन्म और जिसका कुल प्रशंसित कर्म्म किये गये के समान और जिसका संग्राम में वा विचार में रोकनेवाला नहीं है, वही सुख देनेवाला राजा हम लोगों का होवे, ऐसी हम लोग इच्छा करें ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥