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Rigveda Mandal 4 / Sukta 20 / Mantra 6

58 Sukta
11 Mantra
4/20/6
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
गि॒रिर्न यः स्वत॑वाँ ऋ॒ष्व इन्द्रः॑ स॒नादे॒व सह॑से जा॒त उ॒ग्रः। आद॑र्ता॒ वज्रं॒ स्थवि॑रं॒ न भी॒म उ॒द्नेव॒ कोशं॒ वसु॑ना॒ न्यृ॑ष्टम् ॥६॥

गि॒रिः । न । यः । स्वऽत॑वान् । ऋ॒ष्वः । इन्द्रः॑ । स॒नात् । ए॒व । सह॑से । जा॒तः । उ॒ग्रः । आऽद॑र्ता । वज्र॑म् । स्थवि॑रम् । न । भी॒मः । उ॒द्नाऽइ॑व । कोश॑म् । वसु॑ना । निऽऋ॑ष्टम् ॥

Mantra without Swara
गिरिर्न यः स्वतवाँ ऋष्व इन्द्रः सनादेव सहसे जात उग्रः। आदर्ता वज्रं स्थविरं न भीम उद्नेव कोशं वसुना न्यृष्टम् ॥

गिरिः। न। यः। स्वऽतवान्। ऋष्वः। इन्द्रः। सनात्। एव। सहसे। जातः। उग्रः। आऽदर्ता। वज्रम्। स्थविरम्। न। भीमः। उद्नाऽइव। कोशम्। वसुना। निऽऋष्टम् ॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 4 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (गिरिः) मेघ के (न) सदृश (स्वतवान्) अपने गुणों से वृद्ध (ऋष्वः) बड़ा (सनात्) सब काल में (एव) ही (सहसे) बल के लिये (जातः) प्रसिद्ध (उग्रः) तीव्र स्वभावयुक्त (इन्द्रः) सूर्य्य के समान प्रतापी (स्थविरम्) स्थूल (वज्रम्) बिजुलीरूप के (न) समान (आदर्त्ता) सब प्रकार से शत्रुओं का नाश करनेवाला (भीमः) भयङ्कर और (कोशम्) मेघ को (उद्नेव) जलों के सदृश (वसुना) धन से (न्यृष्टम्) अत्यन्त प्राप्त करता है, वही विजयी होने के योग्य होता है ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जो मेघ के सदृश बड़ा प्रजाओं का सुख करने और सनातनधर्म्म का सेवन करनेवाला, बिजुली के सदृश भयंकर, नहीं नाश होनेवाले खजाने से युक्त, शत्रुओं का नाश करनेवाला और बलवान् होवे, वह सब का राजा होने को योग्य है, ऐसा जानिये ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥