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Rigveda Mandal 4 / Sukta 20 / Mantra 5

58 Sukta
11 Mantra
4/20/5
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि यो र॑र॒प्श ऋषि॑भि॒र्नवे॑भिर्वृ॒क्षो न प॒क्वः सृण्यो॒ न जेता॑। मर्यो॒ न योषा॑म॒भि मन्य॑मा॒नोऽच्छा॑ विवक्मि पुरुहू॒तमिन्द्र॑म् ॥५॥

वि । यः । र॒रप्शे । ऋषि॑ऽभिः । नवे॑भिः । वृ॒क्षः । न । प॒क्वः । सृण्यः॑ । न । जेता॑ । मर्यः॑ । न । योषा॑म् । अ॒भि । मन्य॑मानः । अच्छ॑ । वि॒व॒क्मि॒ । पु॒रु॒ऽहू॒तम् । इन्द्र॑म् ॥

Mantra without Swara
वि यो ररप्श ऋषिभिर्नवेभिर्वृक्षो न पक्वः सृण्यो न जेता। मर्यो न योषामभि मन्यमानोऽच्छा विवक्मि पुरुहूतमिन्द्रम् ॥

वि। यः। ररप्शे। ऋषिऽभिः। नवेभिः। वृक्षः। न। पक्वः। सृण्यः। न। जेता। मर्यः। न। योषाम्। अभि। मन्यमानः। अच्छ। विवक्मि। पुरुऽहूतम्। इन्द्रम् ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 3 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (नवेभिः) नवीन अध्ययनकर्त्ता (ऋषिभिः) वेदार्थ के जाननेवालों से (वि, ररप्शे) स्तुति किये जाते हो (वृक्षः) वृक्ष के (न) सदृश (पक्वः) पके हुए फल आदि युक्त (सृण्यः) बल को प्राप्त उत्तम प्रकार शिक्षित सेना के (न) सदृश (जेता) जीतनेवाला (मर्य्यः) मनुष्य (योषाम्) स्त्री के (न) तुल्य प्रजा को (अभि, मन्यमानः) प्रत्यक्ष जानता हुआ वर्तमान है, उस (पुरुहूतम्) बहुतों से स्तुति किये गये (इन्द्रम्) प्रशंसित गुणों के धारण करनेवाले को जैसे मैं (अच्छा) उत्तम प्रकार (विवक्मि) विशेष करके उपदेश करता हूँ, वैसे इसको आप लोग भी उपदेश दीजिये ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जो यथार्थवक्ता जनों में प्रशंसा को प्राप्त, वृक्ष के सदृश दृढ़ उत्साहरूप फलवान्, अकेला सेना के सदृश जीतनेवाला, पतिव्रता स्त्री के सदृश प्रजा में प्रसन्न होवे, उस प्रशंसित को राजा आप लोग मानो ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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