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Rigveda Mandal 4 / Sukta 20 / Mantra 2

58 Sukta
11 Mantra
4/20/2
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ न॒ इन्द्रो॒ हरि॑भिर्या॒त्वच्छा॑र्वाची॒नोऽव॑से॒ राध॑से च। तिष्ठा॑ति व॒ज्री म॒घवा॑ विर॒प्शीमं य॒ज्ञमनु॑ नो॒ वाज॑सातौ ॥२॥

आ । नः॒ । इन्द्रः॑ । हरि॑ऽभिः । या॒तु॒ । अच्छ॑ । अ॒र्वा॒ची॒नः । अव॑से । राध॑से । च॒ । तिष्ठा॑ति । व॒ज्री । म॒घऽवा॑ । वि॒ऽर॒प्शी । इ॒मम् । य॒ज्ञम् । अनु॑ । नः॒ । वाज॑ऽसातौ ॥

Mantra without Swara
आ न इन्द्रो हरिभिर्यात्वच्छार्वाचीनोऽवसे राधसे च। तिष्ठाति वज्री मघवा विरप्शीमं यज्ञमनु नो वाजसातौ ॥

आ। नः। इन्द्रः। हरिऽभिः। यातु। अच्छ। अर्वाचीनः। अवसे। राधसे। च। तिष्ठाति। वज्री। मघऽवा। विऽरप्शी। इमम्। यज्ञम्। अनु। नः। वाजऽसातौ ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 3 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (अर्वाचीनः) इस काल में उत्पन्न (मघवा) न्याय से इकट्ठे किये हुए धन के होने से आदर करने योग्य (वज्री) शस्त्रों और अस्त्रों का जाननेवाले (विरप्शी) बड़ा (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्य्यवाला राजा (हरिभिः) श्रेष्ठ मनुष्यों के साथ (नः) हम लोगों को वा हम लोगों के (अवसे) अन्न आदि के (च) और (राधसे) धन के लिये (अच्छ) उत्तम प्रकार (आ, यातु) प्राप्त हो (इमम्) इस (यज्ञम्) प्रजापालनरूप यज्ञ का (नः) हम लोगों के (वाजसातौ) सङ्ग्राम में (अनु, तिष्ठाति) अनुष्ठान करे, उसी को राजा मानो ॥२॥
Essence
जो राजा उत्तम सभा के जनों से प्रजा के सुख के लिये अन्न और धन बहुत करके सङ्ग्राम में जीतनेवाला न्यायकारी होवे, वही राजा होने को योग्य होवे ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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