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Rigveda Mandal 4 / Sukta 20 / Mantra 11

58 Sukta
11 Mantra
4/20/11
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
नू ष्टु॒त इ॑न्द्र॒ नू गृ॑णा॒न इषं॑ जरि॒त्रे न॒द्यो॒३॒॑ न पी॑पेः। अका॑रि ते हरिवो॒ ब्रह्म॒ नव्यं॑ धि॒या स्या॑म र॒थ्यः॑ सदा॒साः ॥११॥

नु । स्तु॒तः । इ॒न्द्र॒ । नु । गृ॒णा॒नः । इष॑म् । ज॒रि॒त्रे । न॒द्यः॑ । न । पी॒पे॒रिति॑ पीपेः । अका॑रि । ते॒ । ह॒रि॒ऽवः॒ । ब्रह्म॑ । नव्य॑म् । धि॒या । स्या॒म॒ । र॒थ्यः॑ । सदा॒ऽसाः ॥

Mantra without Swara
नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो३ न पीपेः। अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः ॥

नु। स्तुतः। इन्द्र। नु। गृणानः। इषम्। जरित्रे। नद्यः। न। पीपेरिति पीपेः। अकारि। ते। हरिऽवः। ब्रह्म। नव्यम्। धिया। स्याम। रथ्यः। सदाऽसाः ॥११॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 4 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सुख के देनेवाले ! (स्तुतः) प्रशंसित हुए आप (जरित्रे) सत्य कहनेवाले के लिये (नव्यम्) नवीन (ब्रह्म) बड़े धन वा अन्न की (नु) शीघ्र (नद्यः) नदियों के (न) सदृश (पीपेः) वृद्धि करो और (गृणानः) स्तुति करता हुआ नवीन (इषम्) विज्ञान की वृद्धि करो हे (हरिवः) बहुत सेना के अङ्गों से युक्त ! जिसके लिये (ते) आपके हम लोगों ने (धिया) कर्म से नवीन बड़ा धन वा अन्न (अकारि) किया उसके सहाय से (सदासाः) समान दान देनेवाले सेवक हम लोग (रथ्यः) बहुत सुन्दर रथ आदिकों से युक्त (नु) निश्चय (स्याम) होवें ॥११॥
Essence
मन्त्री, सेना और प्रजाजनों को श्रेष्ठ कर्म्म करते हुए राजा की स्तुति जैसी कर्त्तव्य है, वैसी ही राजा को भी इन उत्तम कर्म्मों में प्रवर्त्तमान लोगों की प्रशंसा करनी चाहिये ॥११॥ इस सूक्त में इन्द्र, राजा, अमात्य और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥११॥ यह बीसवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उपदेशविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥