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Rigveda Mandal 4 / Sukta 20 / Mantra 10

58 Sukta
11 Mantra
4/20/10
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मा नो॑ मर्धी॒रा भ॑रा द॒द्धि तन्नः॒ प्र दा॒शुषे॒ दात॑वे॒ भूरि॒ यत्ते॑। नव्ये॑ दे॒ष्णे श॒स्ते अ॒स्मिन्त॑ उ॒क्थे प्र ब्र॑वाम व॒यमि॑न्द्र स्तु॒वन्तः॑ ॥१०॥

मा । नः॒ । म॒र्धीः॒ । आ । भ॒र॒ । द॒द्धि । तत् । नः॒ । प्र । दा॒शुषे॑ । दात॑वे । भूरि॑ । यत् । ते॒ । नव्ये॑ । दे॒ष्णे । श॒स्ते । अ॒स्मिन् । ते॒ । उ॒क्थे । प्र । ब्र॒वा॒म॒ । व॒यम् । इ॒न्द्र॒ । स्तु॒वन्तः॑ ॥

Mantra without Swara
मा नो मर्धीरा भरा दद्धि तन्नः प्र दाशुषे दातवे भूरि यत्ते। नव्ये देष्णे शस्ते अस्मिन्त उक्थे प्र ब्रवाम वयमिन्द्र स्तुवन्तः ॥

मा। नः। मर्धीः। आ। भर। दद्धि। तत्। नः। प्र। दाशुषे। दातवे। भूरि। यत्। ते। नव्ये। देष्णे। शस्ते। अस्मिन्। ते। उक्थे। प्र। ब्रवाम। वयम्। इन्द्र। स्तुवन्तः ॥१०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 4 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) राजन् ! आप (नः) हम लोगों को (मा) मत (मर्धीः) गीला कीजिये हम लोगों के लिये (तत्) उस धन को (आ, भर) धारण कीजिये (यत्) जो (ते) आपके (अस्मिन्) इस (नव्ये) नवीन (देष्णे) देने और (ते) आपके (शस्ते) प्रशंसित (उक्थे) कहने योग्य व्यवहार में (भूरि) बहुत द्रव्य है वह (दाशुषे) दानशील के लिये (दातवे) देने को (प्र) अत्यन्त धारण कीजिये और (नः) हम सब लोगों के लिये (दद्धि) दीजिये और (स्तुवन्तः) स्तुति करते हुए (वयम्) हम लोग यह आपको (प्र, ब्रवाम) उपदेश करें ॥१०॥
Essence
हे राजन् ! आपके लिये करने योग्य कर्म्म जो-जो कहें उस-उसका आचरण करो और प्रजा, मन्त्री और राज्य की उन्नति के लिये बहुत धन, विद्या और न्याय को फैलाओ ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥