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Rigveda Mandal 4 / Sukta 20 / Mantra 1

58 Sukta
11 Mantra
4/20/1
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ न॒ इन्द्रो॑ दू॒रादा न॑ आ॒साद॑भिष्टि॒कृदव॑से यासदु॒ग्रः। ओजि॑ष्ठेभिर्नृ॒पति॒र्वज्र॑बाहुः स॒ङ्गे स॒मत्सु॑ तु॒र्वणिः॑ पृत॒न्यून् ॥१॥

आ । नः॒ । इन्द्रः॑ । दू॒रात् । आ । नः॒ । आ॒सात् । अ॒भि॒ष्टि॒ऽकृत् । अव॑से । या॒स॒त् । उ॒ग्रः । ओजि॑ष्ठेभिः । नृ॒ऽपतिः॑ । वज्र॑ऽबाहुः । स॒म्ऽगे । स॒मत्ऽसु॑ । पृ॒त॒न्यून् ॥

Mantra without Swara
आ न इन्द्रो दूरादा न आसादभिष्टिकृदवसे यासदुग्रः। ओजिष्ठेभिर्नृपतिर्वज्रबाहुः सङ्गे समत्सु तुर्वणिः पृतन्यून् ॥

आ। नः। इन्द्रः। दूरात्। आ। नः। आसात्। अभिष्टिऽकृत्। अवसे। यासत्। उग्रः। ओजिष्ठेभिः। नृऽपतिः। वज्रऽबाहुः। सम्ऽगे। समत्ऽसु। तुर्वणिः। पृतन्यून् ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 3 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजा और प्रजाजनो ! जो (अभिष्टिकृत्) अपेक्षित सुख करनेवाला (वज्रबाहुः) शस्त्रविशेष जिसकी बाहु में विद्यमान (उग्रः) जो तेजस्वी (नृपतिः) मनुष्यों का पालन करनेवाला (तुर्वणिः) शीघ्रकारी (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्यवान् राजा (ओजिष्ठेभिः) अत्यन्त बल आदि गुणों से युक्त मनुष्यों में उत्तम सेनाजनों के साथ (नः) हम लोगों की वा हम लोगों के अर्थ (अवसे) रक्षा आदि के लिये (दूरात्) दूर और (आसात्) समीप से वा (आ) सब प्रकार सेना (यासत्) प्राप्त होवे और (समत्सु) सङ्ग्रामों में (पृतन्यून्) अपनी सेना की इच्छा करनेवाले (नः) हम लोगों को (सङ्गे) साथ (आ) प्राप्त होवे, वह हम लोगों से सदा ही रक्षा करने और सत्कार करने योग्य है ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! सब प्रकार से रक्षा करनेवाले, बड़े बलिष्ठ, विद्या और बलयुक्त श्रेष्ठ सेनाजनों के सहित वर्त्तमान और सङ्ग्राम में जीतनेवाले राजा को स्वीकार करके सब काल में आनन्द करो ॥१॥
Subject
अब ग्यारह ऋचावाले बीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्रपदवाच्य राजगुणों को कहते हैं ॥१॥