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Rigveda Mandal 4 / Sukta 2 / Mantra 8

58 Sukta
20 Mantra
4/2/8
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यस्त्वा॑ दो॒षा य उ॒षसि॑ प्र॒शंसा॑त्प्रि॒यं वा॑ त्वा कृ॒णव॑ते ह॒विष्मा॑न्। अश्वो॒ न स्वे दम॒ आ हे॒म्यावा॒न्तमंह॑सः पीपरो दा॒श्वांस॑म् ॥८॥

यः । त्वा॒ । दो॒षा । यः । उ॒षसि॑ । प्र॒ऽशंसा॑त् । प्रि॒यम् । वा॒ । त्वा॒ । कृ॒णव॑ते । ह॒विष्मा॑न् । अश्वः॑ । न । स्वे । दमे॑ । आ । हे॒म्याऽवा॑न् । तम् । अंह॑सः । पी॒प॒रः॒ । दा॒श्वांस॑म् ॥

Mantra without Swara
यस्त्वा दोषा य उषसि प्रशंसात्प्रियं वा त्वा कृणवते हविष्मान्। अश्वो न स्वे दम आ हेम्यावान्तमंहसः पीपरो दाश्वांसम् ॥

यः। त्वा। दोषा। यः। उषसि। प्रऽशंसात्। प्रियम्। वा। त्वा। कृणवते। हविष्मान्। अश्वः। न। स्वे। दमे। आ। हेम्याऽवान्। तम्। अंहसः। पीपरः। दाश्वांसम्॥८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 17 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् पुरुष ! (यः) जो (त्वा) आपकी (दोषा) रात्रि में और (उषसि) दिन में (त्वा) आपकी (आ, प्रशंसात्) सब प्रकार प्रशंसा करे (वा) अथवा (यः) जो (हविष्मान्) उत्तम दान की सामग्री से युक्त (हेम्यावान्) जिसके जल में प्रकट हुई रात्रि विद्यमान (तम्) उस (दाश्वांसम्) देनेवाले आपको (स्वे) अपने (दमे) घर में (अंहसः) अपराध से (अश्वः) घोड़े के (न) सदृश (पीपरः) पाले उस (प्रियम्) प्रिय सुख (कृणवते) करते हुए के लिये आप सुख दीजिये ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो लोग दिन और रात्रि आप का उत्साह बढ़ावें, उनको आप लोग घास आदि से घोड़ों को जैसे वैसे आनन्द देओ ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥