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Rigveda Mandal 4 / Sukta 2 / Mantra 6

58 Sukta
20 Mantra
4/2/6
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यस्त॑ इ॒ध्मं ज॒भर॑त्सिष्विदा॒नो मू॒र्धानं॑ वा त॒तप॑ते त्वा॒या। भुव॒स्तस्य॒ स्वत॑वाँ पा॒युर॑ग्ने॒ विश्व॑स्मात्सीमघाय॒त उ॑रुष्य ॥६॥

यः । ते॒ । इ॒ध्मम् । ज॒भर॑त् । सि॒ष्वि॒दा॒नः । मू॒र्धान॑म् । वा । त॒तप॑ते । त्वा॒ऽया । भुवः॑ । तस्य॑ । स्वऽत॑वान् । पा॒युः । अ॒ग्ने॒ । विश्व॑स्मात् । सी॒म् । अ॒घ॒ऽय॒तः । उ॒रु॒ष्य॒ ॥

Mantra without Swara
यस्त इध्मं जभरत्सिष्विदानो मूर्धानं वा ततपते त्वाया। भुवस्तस्य स्वतवाँ पायुरग्ने विश्वस्मात्सीमघायत उरुष्य ॥

यः। ते। इध्मम्। जभरत्। सिस्विदानः। मूर्धानम्। वा। ततपते। त्वाऽया। भुवः। तस्य। स्वऽतवान्। पायुः। अग्ने। विश्वस्मात्। सीम्। अघऽयतः। उरुष्य॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 17 Mantra » 1

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Meaning
हे (ततपते) लम्बे चौड़े बिथरे हुए चराचर पदार्थों की पालना करने और (अग्ने) अग्नि पवित्र करनेवाले ! (यः) जो (सिष्विदानः) स्नेहयुक्त (स्वतवान्) अपने से बढ़ा (पायुः) रक्षा करनेवाला (त्वाया) आपको प्राप्त होता (ते) आपकी (भुवः) पृथिवी के (इध्मम्) तपे हुए (मूर्धानम्) मस्तक को (जभरत्) पोषण करता है, उसकी आप (उरुष्य) रक्षा करो (वा) अथवा (तस्य) उसके मस्तक की (सीम्) सब प्रकार रक्षा करो (अघायतः) अपने को पाप की इच्छा करते हुए का (विश्वस्मात्) सब प्रकार से मस्तक काटो ॥६॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो लोग आप लोगों के प्रताप शरीर और राज्य की रक्षा करके दुष्टों का सब प्रकार नाश करते हैं, उनकी निरन्तर रक्षा करो ॥६॥
Subject
अब अगले मन्त्र में राजविषय को कहते हैं ॥

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