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Rigveda Mandal 4 / Sukta 2 / Mantra 5

58 Sukta
20 Mantra
4/2/5
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
गोमाँ॑ अ॒ग्नेऽवि॑माँ अ॒श्वी य॒ज्ञो नृ॒वत्स॑खा॒ सद॒मिद॑प्रमृ॒ष्यः। इळा॑वाँ ए॒षो अ॑सुर प्र॒जावा॑न्दी॒र्घो र॒यिः पृ॑थुबु॒ध्नः स॒भावा॑न् ॥५॥

गोऽमा॑न् । अ॒ग्ने॒ । अवि॑ऽमान् । अ॒श्वी । य॒ज्ञः । नृ॒वत्ऽस॑खा । सद॑म् । इत् । अ॒प्र॒ऽमृ॒ष्यः । इळा॑ऽवान् । ए॒षः । अ॒सु॒र॒ । प्र॒जाऽवा॑न् । दी॒र्घः । र॒यिः । पृ॒थु॒ऽबु॒ध्नः । स॒भाऽवा॑न् ॥

Mantra without Swara
गोमाँ अग्नेऽविमाँ अश्वी यज्ञो नृवत्सखा सदमिदप्रमृष्यः। इळावाँ एषो असुर प्रजावान्दीर्घो रयिः पृथुबुध्नः सभावान् ॥

गोऽमान्। अग्ने। अविऽमान्। अश्वी। यज्ञः। नृवत्ऽसखा। सदम्। इत्। अप्रमृष्यः। इळाऽवान्। एषः। असुर। प्रजाऽवान्। दीर्घः। रयिः। पृथुऽबुध्नः। सभाऽवान्॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 16 Mantra » 5

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Meaning
हे (असुर) दुष्ट पुरुषों के दूर करनेवाले (अग्ने) विद्वन् पुरुष ! आप (गोमान्) बहुत गौओं और (अविमान्) बहुत भेड़ों से युक्त (अश्वी) बहुत घोड़ोंवाला (यज्ञः) प्राप्त होने योग्य (नृवत्सखा) नायकों से युक्त मनुष्यों में मित्र (इळावान्) बहुत अन्नयुक्त (प्रजावान्) जिसमें बहुत प्रजा विद्यमान ऐसे (पृथुबुध्नः) विस्तारसहित प्रबन्धवाला (सभावान्) उत्तम सभा विद्यमान जिनको ऐसे (अप्रमृष्यः) दूसरों से नहीं दबाने योग्य हैं तथा (एषः) यह (रयिः) धन (दीर्घः) बड़ा हुआ है, वह आप (इत्) ही (सदम्) स्थान को प्राप्त हूजिये ॥५॥
Essence
मनुष्यों को वही सभाध्यक्ष करना चाहिये कि जो गौओं, भेड़ों और घोड़ों का पालक और दूसरों से नहीं भय करने और दुष्ट जनों को दूर करनेवाला, अच्छे प्रबन्ध से युक्त तथा प्रजावाला हो ॥५॥
Subject
अब राजा के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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