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Rigveda Mandal 4 / Sukta 2 / Mantra 3

58 Sukta
20 Mantra
4/2/3
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अत्या॑ वृध॒स्नू रोहि॑ता घृ॒तस्नू॑ ऋ॒तस्य॑ मन्ये॒ मन॑सा॒ जवि॑ष्ठा। अ॒न्तरी॑यसे अरु॒षा यु॑जा॒नो यु॒ष्मांश्च॑ दे॒वान्विश॒ आ च॒ मर्ता॑न् ॥३॥

अत्या॑ । वृ॒ध॒स्नू इति॑ वृ॒ध॒ऽस्नू । रोहि॑ता । घृ॒तस्नू॒ इति॑ घृ॒तऽस्नू॑ । ऋ॒तस्य॑ । म॒न्ये॒ । मन॑सा । जवि॑ष्ठा । अ॒न्तः । ई॒य॒से॒ । अ॒रु॒षा । यु॒जा॒नः । यु॒ष्मान् । च॒ । दे॒वान् । विशः॑ । आ । च॒ । मर्ता॑न् ॥

Mantra without Swara
अत्या वृधस्नू रोहिता घृतस्नू ऋतस्य मन्ये मनसा जविष्ठा। अन्तरीयसे अरुषा युजानो युष्मांश्च देवान्विश आ च मर्तान् ॥

अत्या। वृधस्नू इति वृधऽस्नू। रोहिता। घृतस्नू इति घृतऽस्नू। ऋतस्य। मन्ये। मनसा। जविष्ठा। अन्तः। ईयसे। अरुषा। युजानः। युष्मान्। च। देवान्। विशः। आ। च। मर्तान्॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 16 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! पुरुष जो आप (ऋतस्य) जल की (वृधस्नू) समृद्धि का विस्तार करते हुए (रोहिता) और अग्नि गुण के सहित (घृतस्नू) जल को बहाते हुए (अरुषा) रक्तगुण विशिष्ट (मनसा) मन से भी (जविष्ठा) अत्यन्त वेगवाले (अत्या) मार्ग को व्याप्त होते हुए वायु और अग्नि को (युजानः) संयुक्त करते हुए (देवान्) विद्वान् (युष्मान्) आप लोगों (च) और (मर्त्तान्) साधारण मनुष्यों को (च) और (विशः) प्रजाओं को (अन्तः) मध्य में (आ) सब प्रकार (ईयसे) प्राप्त होते हो, उनको मैं (मन्ये) मानता हूँ ॥३॥
Essence
जो मनुष्य लोग वायु और अग्नि को जलों के साथ वाहन के यन्त्रों में संयुक्त करके चलाते हैं तो वेग और प्रहरण नामक जल और भाफ के गुण, मन के सदृश वाहन आदिकों को चलाते हैं ॥३॥
Subject
अब इस अगले मन्त्र में प्रजा के कृत्य का वर्णन करते हैं ॥