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Rigveda Mandal 4 / Sukta 2 / Mantra 20

58 Sukta
20 Mantra
4/2/20
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒ता ते॑ अग्न उ॒चथा॑नि वे॒धोऽवो॑चाम क॒वये॒ ता जु॑षस्व। उच्छो॑चस्व कृणु॒हि वस्य॑सो नो म॒हो रा॒यः पु॑रुवार॒ प्र य॑न्धि ॥२०॥

ए॒ता । ते॒ । अ॒ग्ने॒ । उ॒चथा॑नि । वे॒धः । अवो॑चाम । क॒वये॑ । ता । जु॒ष॒स्व॒ । उत् । शो॒च॒स्व॒ । कृ॒णु॒हि । वस्य॑सः । नः॒ । म॒हः । रा॒यः । पु॒रु॒ऽवा॒र॒ । प्र । य॒न्धि॒ ॥

Mantra without Swara
एता ते अग्न उचथानि वेधोऽवोचाम कवये ता जुषस्व। उच्छोचस्व कृणुहि वस्यसो नो महो रायः पुरुवार प्र यन्धि ॥

एता। ते। अग्ने। उचथानि। वेधः। अवोचाम। कवये। ता। जुषस्व। उत्। शोचस्व। कृणुहि। वस्यसः। नः। महः। रायः। पुरुऽवार। प्र। यन्धि॥२०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 19 Mantra » 5

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Meaning
हे (वेधः) बुद्धिमान् (अग्ने) विद्वान् धार्मिक राजन् ! हम लोग (कवये) सब विद्या से युक्त (ते) आपके लिये जिन (एता) इन (उचथानि) उचित वचनों को (अवोचाम) कहें (ता) उनको आप (जुषस्व) सेवो और (उत्, शोचस्व) अत्यन्त विचारो (कृणुहि) करो (पुरुवार) हे बहुत आप्त अर्थात् सत्यवादी पुरुषों का स्वीकार करनेवाले ! (नः) हम लोगों के लिये (महः) बड़े (वस्यसः) अतिशयित निवसे धरे हुए (रायः) धनों को (प्र, यन्धि) उत्तमता से देओ ॥२०॥
Essence
राजा को चाहिये कि यथार्थवक्ता ही पुरुषों के वचनों को सुन और उत्तम प्रकार विचार कर सेवन करें, उन यथार्थवक्ता पुरुषों के लिये प्रिय वस्तुओं को देकर वे निरन्तर सन्तुष्ट करने योग्य हैं, इस प्रकार राजा और यथार्थवक्ता पुरुषों की सभा सब मिल कर सब कर्म्मों को सिद्ध करें ॥२०॥ इस सूक्त में राजा, प्रजा और यथार्थवक्ता पुरुष के कृत्यवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥२०॥ यह द्वितीय सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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