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Rigveda Mandal 4 / Sukta 2 / Mantra 19

58 Sukta
20 Mantra
4/2/19
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अक॑र्म ते॒ स्वप॑सो अभूम ऋ॒तम॑वस्रन्नु॒षसो॑ विभा॒तीः। अनू॑नम॒ग्निं पु॑रु॒धा सु॑श्च॒न्द्रं दे॒वस्य॒ मर्मृ॑जत॒श्चारु॒ चक्षुः॑ ॥१९॥

अक॑र्म । ते॒ । सि॒ऽअप॑सः । अ॒भू॒म॒ । ऋ॒तम् । अ॒व॒स्र॒न् । उ॒षसः॑ । वि॒ऽभा॒तीः । अनू॑नम् । अ॒ग्निम् । पु॒रु॒धा । सु॒ऽच॒न्द्रम् । दे॒वस्य॑ । मर्मृ॑जतः । चारु॑ । चक्षुः॑ ॥

Mantra without Swara
अकर्म ते स्वपसो अभूम ऋतमवस्रन्नुषसो विभातीः। अनूनमग्निं पुरुधा सुश्चन्द्रं देवस्य मर्मृजतश्चारु चक्षुः ॥

अकर्म। ते। सुऽअपसः। अभूम। ऋतम्। अवस्रन्। उषसः। विभातीः। अनूनम्। अग्निम्। पुरुधा। सुऽचन्द्रम्। देवस्य। मर्मृजतः। चारु। चक्षुः॥१९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 19 Mantra » 4

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Meaning
हे राजन् ! जैसे (विभातीः) प्रकाश करती हुई (उषसः) प्रभातवेलाओं को (अनूनम्) और बहुत (सुश्चन्द्रम्) सुन्दर सुवर्ण जिससे होता उसको (मर्मृजतः) अत्यन्त शोधते हुए (देवस्य) कामना करनेवाले के (चारु) सुन्दर (चक्षुः) नेत्र (अग्निम्) और अग्नि को (पुरुधा) बहुत प्रकारों से (अवस्रन्) वसते हैं, वैसे ही (ऋतम्) सत्य की सेवा करते और (स्वपसः) उत्तम धर्म-सम्बन्धी कर्म करते हुए हम लोग अत्यन्त शुद्धता तथा कामना करते हुए के हित को (अकर्म) करें और (ते) आपके मित्र (अभूम) होवें ॥१९॥
Essence
हे राजन् ! जैसे सूर्य्य से उत्पन्न प्रातःकाल सब को शोभित करता है, वैसे ही ब्रह्मचर्य्य से हुए विद्वान् हम लोग आपकी आज्ञानुकूल जैसे वर्ते, वैसे ही आप हम लोगों का हित निरन्तर करो और सब हम लोग परस्पर मेल करके और अन्याय दूर करके धर्मसम्बन्धी कर्मों को प्रवृत्त करें ॥१९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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