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Rigveda Mandal 4 / Sukta 2 / Mantra 18

58 Sukta
20 Mantra
4/2/18
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ यू॒थेव॑ क्षु॒मति॑ प॒श्वो अ॑ख्यद्दे॒वानां॒ यज्जनि॒मान्त्यु॑ग्र। मर्ता॑नां चिदु॒र्वशी॑रकृप्रन्वृ॒धे चि॑द॒र्य उप॑रस्या॒योः ॥१८॥

आ । यू॒थाऽइ॑व । क्षु॒ऽमति॑ । प॒श्वः । अ॒ख्य॒त् । दे॒वाना॑म् । यत् । ज॒नि॒म । अन्ति॑ । उ॒ग्र॒ । मर्ता॑नाम् । चि॒त् । उ॒र्वशीः॑ । अ॒कृ॒प्र॒न् । वृ॒धे । चि॒त् । अ॒र्यः । उप॑रस्य । आ॒योः ॥

Mantra without Swara
आ यूथेव क्षुमति पश्वो अख्यद्देवानां यज्जनिमान्त्युग्र। मर्तानां चिदुर्वशीरकृप्रन्वृधे चिदर्य उपरस्यायोः ॥

आ। यूथाऽइव। क्षुऽमति। पश्वः। अख्यत्। देवानाम्। यत्। जनिम। अन्ति। उग्र। मर्तानाम्। चित्। उर्वशीः। अकृप्रन्। वृधे। चित्। अर्यः। उपरस्य। आयोः॥१८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 19 Mantra » 3

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Meaning
हे (उग्र) तेजस्वी राजन् ! आप (देवानाम्) विद्वान् (मर्त्तानाम्) मनुष्यों के (अन्ति) समीप में (यत्) जिन (जनिम) जन्मों को (आ, अख्यत्) सब ओर से प्रसिद्ध करते वा (क्षुमति) बहुत अन्न जिसमें विद्यमान उसमें (यूथेव) सेनाजनों के सदृश प्रसिद्ध करते हैं (अर्य्यः) और जैसे स्वामी (चित्) वैसे (उपरस्य) मेघ और (आयोः) जीवन प्राप्त करानेवाले (पश्वः) पशु की (चित्) भी (वृधे) वृद्धि के लिये (उर्वशीः) बहुत व्याप्त होनेवाली क्रियाओं की विद्वान् लोग (अकृप्रन्) कल्पना करते हैं ॥१८॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्यों के मध्य में राजा का जन्म वह बड़े पुण्य से उत्पन्न हुआ ऐसा जानना चाहिये। जो राजा विद्यमान न हो तो कोई भी स्वस्थता को नहीं प्राप्त हो और जैसे मेघ के समीप से सब का जीवन और वृद्धि होती है, वैसे ही राजा के समीप से सब प्रजा की वृद्धि और जीवन होता है ॥१८॥
Subject
अब राजा के विषय को कहते हैं ॥

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