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Rigveda Mandal 4 / Sukta 2 / Mantra 16

58 Sukta
20 Mantra
4/2/16
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अधा॒ यथा॑ नः पि॒तरः॒ परा॑सः प्र॒त्नासो॑ अग्न ऋ॒तमा॑शुषा॒णाः। शुचीद॑य॒न्दीधि॑तिमुक्थ॒शासः॒ क्षामा॑ भि॒न्दन्तो॑ अरु॒णीरप॑ व्रन् ॥१६॥

अध॑ । यथा॑ । नः॒ । पि॒तरः॑ । परा॑सः । प्र॒त्नासः॑ । अ॒ग्ने॒ । ऋ॒तम् । आ॒शु॒षा॒णाः । शुचि॑ । इत् । अ॒य॒न् । दीधि॑तिम् । उ॒क्थ॒ऽशासः । क्षामा॑ । भि॒न्दन्तः॑ । अ॒रु॒णीः । अप॑ । व्र॒न् ॥

Mantra without Swara
अधा यथा नः पितरः परासः प्रत्नासो अग्न ऋतमाशुषाणाः। शुचीदयन्दीधितिमुक्थशासः क्षामा भिन्दन्तो अरुणीरप व्रन् ॥

अध। यथा। नः। पितरः। परासः। प्रत्नासः। अग्ने। ऋतम्। आशुषाणाः। शुचि। इत्। अयन्। दीधितिम्। उक्थऽशसः। क्षाम। भिन्दन्तः। अरुणीः। अप। व्रन्॥१६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 19 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान राजन् ! (यथा) जिस प्रकार से (नः) हम लोगों के (परासः) होनेवाले (प्रत्नासः) हुए (पितरः) उत्पन्न करनेवाले पितृ लोग (शुचि) पवित्र, शुद्धि करनेवाले (ऋतम्) सत्य न्याययुक्त व्यवहार को (आशुषाणाः) सब प्रकार बाँटते और (उक्थशासः) प्रशंसित शासनोंवाले (क्षाम) पृथिवी को (भिन्दन्तः) विदारते हुए (दीधितिम्) नीति के प्रकाश को (अयन्) प्राप्त होते हैं (अध) इसके अनन्तर (अरुणीः) प्राप्त प्रजाओं को (अप) (व्रन्) स्वीकार करें, वैसे (इत्) ही आप हम लोगों में वर्त्ताव करो ॥१६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा और राजपुरुष प्रजाओं में पिता के सदृश वर्त्ताव करके सत्य, न्याय का प्रकाश कर और अविद्या को दूर करके प्रजाओं को शिक्षा देते हैं, वे पवित्र गिने जाते हैं ॥१६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥