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Rigveda Mandal 4 / Sukta 2 / Mantra 15

58 Sukta
20 Mantra
4/2/15
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अधा॑ मा॒तुरु॒षसः॑ स॒प्त विप्रा॒ जाये॑महि प्रथ॒मा वे॒धसो॒ नॄन्। दि॒वस्पु॒त्रा अङ्गि॑रसो भवे॒माद्रिं॑ रुजेम ध॒निनं॑ शु॒चन्तः॑ ॥१५॥

अध॑ । मा॒तुः । उ॒षसः॑ । स॒प्त । विप्राः॑ । जाये॑महि । प्र॒थ॒माः । वे॒धसः॑ । नॄन् । दि॒वः । पु॒त्राः । अङ्गि॑रसः । भ॒वे॒म॒ । अद्रि॑म् । रु॒जे॒म॒ । ध॒निन॑म् । शु॒चन्तः॑ ॥

Mantra without Swara
अधा मातुरुषसः सप्त विप्रा जायेमहि प्रथमा वेधसो नॄन्। दिवस्पुत्रा अङ्गिरसो भवेमाद्रिं रुजेम धनिनं शुचन्तः ॥

अध। मातुः। उषसः। सप्त। विप्राः। जायेमहि। प्रथमाः। वेधसः। नॄन्। दिवः। पुत्राः। अङ्गिरसः। भवेम। अद्रिम्। रुजेम। धनिनम्। शुचन्तः॥१५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 18 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (उषसः) प्रभातवेला के दिन के समान सात प्रकार के किरणें होते हैं, वैसे ही (मातुः) माता के सदृश वर्त्तमान विद्या से हम लोग (प्रथमाः) प्रथम प्रसिद्ध (विप्राः) बुद्धिमान् (सप्त) सात प्रकार के अर्थात् राजा, प्रधान, मन्त्री, सेना, सेना के अध्यक्ष, प्रजा और चारादि (जायेमहि) होवें और (वेधसः) बुद्धिमान् (नॄन्) नायक पुरुषों को प्राप्त हों और (दिवः) प्रकाश के (पुत्राः) विस्तारनेवाले (अङ्गिरसः) जैसे प्राणवायु (अद्रिम्) मेघ को वैसे शत्रु को (रुजेम) छिन्न-भिन्न करें (अध) इसके अनन्तर (धनिनम्) बहुत धनयुक्त प्रजा में विद्यमान को (शुचन्तः) विद्या और विनय से पवित्र करते हुए (भवेम) प्रसिद्ध होवें ॥१५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा लोग बुद्धिमान् मन्त्रियों का सत्कार करके रक्षा करते हैं, वे सूर्य्य के सदृश प्रकाशित यशवाले होते हैं और सभी काल में उद्योगियों की रक्षा और दुष्टों का निरन्तर ताड़न करें, जिससे कि सब शुद्ध आचरणवाले होवें ॥१५॥
Subject
अब इस अगले मन्त्र में राजा के विषय को कहते हैं ॥

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