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Rigveda Mandal 4 / Sukta 2 / Mantra 13

58 Sukta
20 Mantra
4/2/13
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वम॑ग्ने वा॒घते॑ सु॒प्रणी॑तिः सु॒तसो॑माय विध॒ते य॑विष्ठ। रत्नं॑ भर शशमा॒नाय॑ घृष्वे पृ॒थुश्च॒न्द्रमव॑से चर्षणि॒प्राः ॥१३॥

त्वम् । अ॒ग्ने॒ । वा॒घते॑ । सु॒ऽप्रनी॑तिः । सु॒तऽसो॑माय । वि॒ध॒ते । य॒वि॒ष्ठ॒ । रत्न॑म् । भ॒र॒ । श॒श॒मा॒नाय॑ । घृ॒ष्वे॒ । पृ॒थु । च॒न्द्रम् । अव॑से । च॒र्ष॒णि॒ऽप्राः ॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने वाघते सुप्रणीतिः सुतसोमाय विधते यविष्ठ। रत्नं भर शशमानाय घृष्वे पृथुश्चन्द्रमवसे चर्षणिप्राः ॥

त्वम्। अग्ने। वाघते। सुऽप्रनीतिः। सुतऽसोमाय। विधते। यविष्ठ। रत्नम्। भर। शशमानाय। घृष्वे। पृथु। चन्द्रम्। अवसे। चर्षणिऽप्राः॥१३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 18 Mantra » 3

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Meaning
हे (घृष्वे) पदार्थों के घिसनेवाले (यविष्ठ) अत्यन्त युवन् (अग्ने) अग्नि के सदृश पूर्णविद्या से प्रकाशमान ! (सुप्रणीतिः) उत्तम प्रकार चली हुई नीति जिनके विद्यमान (पृथु) जिनका पुरुषार्थ विस्तृत हो रहा है (चर्षणिप्राः) जो मनुष्यों को व्याप्त होनेवाले (त्वम्) आप (सुतसोमाय) उत्पन्न किया गया ऐश्वर्य वा ओषधियों का रस जिससे उस (शशमानाय) सब के दुःखों के उल्लङ्घन करनेवाले (विधते) अनेक प्रकार के व्यवहार को यथावत् करते हुए (वाघते) बुद्धिमान् के लिये (अवसे) रक्षण आदि के अर्थ (चन्द्रम्) प्रसन्न करनेवाले सुवर्ण और (रत्नम्) रमणीय मनोहर धन का (भर) धारण करो ॥१३॥
Essence
हे राजन् ! जो धार्मिक शूरवीर विद्वान् लोग शत्रु के बल के उल्लङ्घन करने, परस्पर पदार्थों के घिसने से बिजुली आदि की विद्या के प्रकाश करने और मनुष्यों की रक्षा करनेवाले मन्त्री आदि नौकर होवें, उनके लिये ऐश्वर्य निरन्तर धारण करो ॥१३॥
Subject
अब अगले मन्त्र में राजा के विषय को कहते हैं ॥

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