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Rigveda Mandal 4 / Sukta 2 / Mantra 11

58 Sukta
20 Mantra
4/2/11
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
चित्ति॒मचि॑त्तिं चिनव॒द्वि वि॒द्वान्पृ॒ष्ठेव॑ वी॒ता वृ॑जि॒ना च॒ मर्ता॑न्। रा॒ये च॑ नः स्वप॒त्याय॑ देव॒ दितिं॑ च॒ रास्वादि॑तिमुरुष्य ॥११॥

चित्ति॑म् । अचि॑त्तिम् । चि॒न॒व॒त् । वि । वि॒द्वान् । पृ॒ष्टाऽइ॑व । वी॒ता । वृ॒जि॒ना । च॒ । मर्ता॑न् । रा॒ये । च॒ । नः॒ । सु॒ऽअ॒प॒त्याय॑ । दे॒व॒ । दिति॑म् । च॒ । रास्व॑ । अदि॑तिम् । उ॒रु॒ष्य॒ ॥

Mantra without Swara
चित्तिमचित्तिं चिनवद्वि विद्वान्पृष्ठेव वीता वृजिना च मर्तान्। राये च नः स्वपत्याय देव दितिं च रास्वादितिमुरुष्य ॥

चित्तिम्। अचित्तिम्। चिनवत्। वि। विद्वान्। पृष्ठाऽइव। वीता। वृजिना। च। मर्तान्। राये। च। नः। सुऽअपत्याय। देव। दितिम्। च। रास्व। अदितिम्। उरुष्य॥११॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 18 Mantra » 1

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Meaning
हे (देव) विद्वान् पुरुष ! जो (वि) विशेष करके (विद्वान्) विद्यायुक्त पुरुष (पृष्ठेव) पीठों के सदृश (वीता) प्राप्त (वृजिना) पराक्रमों को (मर्त्तान्) मनुष्यों को (च) भी (नः) हम लोगों के (स्वपत्याय) उत्तम सन्तान जिससे उस (राये) धन के लिये (च) और (चित्तिम्) किया संग्रह जिसमें उस क्रिया और (अचित्तिम्) जिसमें संग्रह नहीं किया उसका (चिनवत्) संग्रह करे, उसके लिये (दितिम्) खण्डित क्रिया को (रास्व) दीजिये (च) और (अदितिम्) अखण्डित क्रिया का (उरुष्य) सेवन कीजिये ॥११॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे ऊँट आदि पीठों से भार को ले चलते हैं, वैसे ही बलवान् पुरुष सब व्यवहार के भार को धारण करते हैं और व्यवहार में जिसका खण्डन और जिसका मण्डन करने योग्य होवे, वह उसका वैसा ही करना चाहिये ॥११॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥