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Rigveda Mandal 4 / Sukta 2 / Mantra 10

58 Sukta
20 Mantra
4/2/10
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यस्य॒ त्वम॑ग्ने अध्व॒रं जुजो॑षो दे॒वो मर्त॑स्य॒ सुधि॑तं॒ ररा॑णः। प्री॒तेद॑स॒द्धोत्रा॒ सा य॑वि॒ष्ठासा॑म॒ यस्य॑ विध॒तो वृ॒धासः॑ ॥१०॥

यस्य॑ । त्वम् । अ॒ग्ने॒ । अ॒ध्व॒रम् । जुजो॑षः । दे॒वः । मर्त॑स्य । सु॒ऽधि॑तम् । ररा॑णः । प्री॒ता । इत् । अ॒स॒त् । होत्रा॑ । सा । य॒वि॒ष्ठ॒ । असा॑म । यस्य॑ । वि॒ध॒तः । वृ॒धासः॑ ॥

Mantra without Swara
यस्य त्वमग्ने अध्वरं जुजोषो देवो मर्तस्य सुधितं रराणः। प्रीतेदसद्धोत्रा सा यविष्ठासाम यस्य विधतो वृधासः ॥

यस्य। त्वम्। अग्ने। अध्वरम्। जुजोषः। देवः। मर्तस्य। सुऽधितम्। रराणः। प्रीता। इत्। असत्। होत्रा। सा। यविष्ठ। असाम। यस्य। विधतः। वृधासः॥१०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 17 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (यविष्ठ) अति जवान (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान विद्वान् पुरुष ! (यस्य) जिसके (अध्वरम्) हिंसारहित व्यवहार का (त्वम्) आप (जुजोषः) अत्यन्त सेवन करते हैं (देवः) उत्तम सुख के देनेवाले हुए (यस्य) जिस (विधतः) विधान करनेवाले (मर्त्तस्य) मनुष्य के (सुधितम्) उत्तम हित के (रराणः) अत्यन्त देनेवाले हों उसकी (सा) वह (होत्रा) ग्रहण करने योग्य क्रिया (प्रीता) प्रसन्न (इत्) ही अर्थात् सफल ही मेरे में (असत्) होवे (वृधासः) वृद्धि करनेवाले होते हुए हम लोग (असाम) प्रसिद्ध होवें और वह हम लोगों को वैसे ही सुख देवे ॥१०॥
Essence
जो जिसके सुख को साधे उस पुरुष को चाहिये कि उस उपकार करनेवाले पुरुष को भी सुख देवें ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥