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Rigveda Mandal 4 / Sukta 19 / Mantra 9

58 Sukta
11 Mantra
4/19/9
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
व॒म्रीभिः॑ पु॒त्रम॒ग्रुवो॑ अदा॒नं नि॒वेश॑नाद्धरिव॒ आ ज॑भर्थ। व्य१॒॑न्धो अ॑ख्य॒दहि॑माददा॒नो निर्भू॑दुख॒च्छित्सम॑रन्त॒ पर्व॑ ॥९॥

व॒म्रीभिः॑ । पु॒त्रम् । अ॒ग्रुवः॑ । अ॒दा॒नम् । नि॒ऽवेश॑नात् । ह॒रि॒ऽवः॒ । आ । ज॒भ॒र्थ॒ । वि । अ॒न्धः । अ॒ख्य॒त् । अहि॑म् । आ॒ऽद॒दा॒नः । निः । भू॒त् । उ॒ख॒ऽछित् । सम् । अ॒र॒न्त॒ । पर्व॑ ॥

Mantra without Swara
वम्रीभिः पुत्रमग्रुवो अदानं निवेशनाद्धरिव आ जभर्थ। व्य१न्धो अख्यदहिमाददानो निर्भूदुखच्छित्समरन्त पर्व ॥

वम्रीभिः। पुत्रम्। अग्रुवः। अदानम्। निऽवेशनात्। हरिऽवः। आ। जभर्थ। वि। अन्धः। अख्यत्। अहिम्। आऽददानः। निः। भूत्। उखऽछित्। सम्। अरन्त। पर्व ॥९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 2 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (हरिवः) प्रशंसित घोड़ों से युक्त राजन् ! जैसे (निवेशनात्) अपने स्थान से (वम्रीभिः) उगली हुई पहाड़ियों से (अग्रुवः) नदियाँ तट आदि का हरण करती हैं, वैसे ही (अदानम्) दान नहीं करनेवाले (पुत्रम्) पुत्र को (आ, जभर्थ) हरते हो और जैसे (अन्धः) अन्धकार करनेवाले (अहिम्) मेघ को (आददानः) ग्रहण करता हुआ (वि, अख्यत्) विख्यात करता है और (उखच्छित्) गमन का काटने अर्थात् मार्ग छिन्न-भिन्न करनेवाला (निः, भूत्) निरन्तर होता (पर्व) और पालनेवाले को (सम् अरन्त) अच्छे प्रकार रमाता है, वैसे ही नहीं दान करनेवाला गति पाता है ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् ! अपना पुत्र भी बुरे लक्षणोंवाला हो तो नहीं अधिकार देने योग्य है और वर्षाकालों में नदियाँ बढ़ती हैं, वैसे ही प्रजाओं की वृद्धि करनी चाहिये ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥