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Rigveda Mandal 4 / Sukta 19 / Mantra 8

58 Sukta
11 Mantra
4/19/8
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पू॒र्वीरु॒षसः॑ श॒रद॑श्च गू॒र्ता वृ॒त्रं ज॑घ॒न्वाँ अ॑सृज॒द्वि सिन्धू॑न्। परि॑ष्ठिता अतृणद्बद्बधा॒नाः सी॒रा इन्द्रः॒ स्रवि॑तवे पृथि॒व्या ॥८॥

पू॒र्वीः । उ॒षसः॑ । श॒रदः॑ । च॒ । गू॒र्ताः । वृ॒त्रम् । ज॒घ॒न्वान् । अ॒सृ॒ज॒त् । वि । सिन्धू॑न् । परि॑ऽस्थिताः । अ॒तृ॒ण॒त् । ब॒द्ब॒धा॒नाः । सी॒राः । इन्द्रः॑ । स्रवि॑तवे । पृ॒थि॒व्या ॥

Mantra without Swara
पूर्वीरुषसः शरदश्च गूर्ता वृत्रं जघन्वाँ असृजद्वि सिन्धून्। परिष्ठिता अतृणद्बद्बधानाः सीरा इन्द्रः स्रवितवे पृथिव्या ॥

पूर्वीः। उषसः। शरदः। च। गूर्ताः। वृत्रम्। जघन्वान्। असृजत्। वि। सिन्धून्। परिऽस्थिताः। अतृणत्। बद्बधानाः। सीराः। इन्द्रः। स्रवितवे। पृथिव्या ॥८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 2 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! जैसे (इन्द्रः) सूर्य्य (पूर्वीः) पुरातन (गूर्त्ताः) चलती हुई हिंसा करनेवाली (उषसः) प्रभातवेला (वृत्रम्) मेघ को (शरदः) शरद् ऋतुओं (च) और हेमन्तादि ऋतुओं को (जघन्वान्) नष्ट किये हुए (सिन्धून्) नद्यादिकों को (वि) अनेक प्रकार (असृजत्) उत्पन्न करता है (परिष्ठिताः) तथा सब ओर से स्थित (बद्बधानाः) बदबदातीं तटों का नाश करती हुईं (सीराः) जो बहनेवाली नदियाँ उनको (स्रवितवे) चलने को (पृथिव्या) पृथिवी के साथ (अतृणत्) नाश करता है, वैसे ही नीति और सेना को उत्पन्न करके विजय सिद्ध करो और युद्ध के लिये चलती हुई उत्तम प्रकार शिक्षित सेना से शत्रुओं का नाश करो ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा प्रातःकाल के सदृश उत्तम नीति और नदी के समूह के सदृश सेना को निर्मित करता है, वही पृथिवी के राज्य के योग्य है ॥८॥
Subject
फिर राज्यविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥