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Rigveda Mandal 4 / Sukta 19 / Mantra 7

58 Sukta
11 Mantra
4/19/7
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्राग्रुवो॑ नभ॒न्वो॒३॒॑ न वक्वा॑ ध्व॒स्रा अ॑पिन्वद्युव॒तीर्ऋ॑त॒ज्ञाः। धन्वा॒न्यज्राँ॑ अपृणक्तृषा॒णाँ अधो॒गिन्द्रः॑ स्त॒र्यो॒३॒॑ दंसु॑पत्नीः ॥७॥

प्र । अ॒ग्रुवः॑ । न॒भ॒न्वः॑ । न । वक्वाः॑ । ध्व॒स्राः । अ॒पि॒न्व॒त् । यु॒व॒तीः । ऋ॒त॒ऽज्ञाः । धन्वा॑नि । अज्रा॑न् । अ॒पृ॒ण॒क् । तृ॒षा॒णान् । अधो॑क् । इन्द्रः॑ । स्त॒र्यः॑ । दम्ऽसु॑पत्नीः ॥

Mantra without Swara
प्राग्रुवो नभन्वो३ न वक्वा ध्वस्रा अपिन्वद्युवतीर्ऋतज्ञाः। धन्वान्यज्राँ अपृणक्तृषाणाँ अधोगिन्द्रः स्तर्यो३ दंसुपत्नीः ॥

प्र। अग्रुवः। नभन्वः। न। वक्वाः। ध्वस्राः। अपिन्वत्। युवतीः। ऋतऽज्ञाः। धन्वानि। अज्रान्। अपृणक्। तृषाणान्। अधोक्। इन्द्रः। स्तर्यः। दम्ऽसुपत्नीः ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 2 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (इन्द्रः) राजा (वक्वाः) टेढ़ी (ध्वस्राः) विध्वंस करनेवाली सेनाओं को और (नभन्वः) शत्रुओं के नाश करनेवाले वीर पुरुष जैसे (अग्रुवः) आगे चलनेवाली नदियों को (न) वैसे (ऋतज्ञाः) सत्य को जाननेवाली (युवतीः) युवती स्त्रियों को (प्र, अपिन्वत्) अच्छे प्रकार सेवे वा सींचे (धन्वानि) और स्थलप्रदेशों को अर्थात् जहाँ-तहाँ मार्गस्थानों को (अज्रान्) तथा नित्य चलनेवाले (तृषाणान्) पियासे मनुष्यादि प्राणियों को (अपृणक्) तृप्त करे वा जो (स्तर्य्यः) आच्छादन करनेवाली (दंसुपत्नीः) कर्म्म करनेवालों की स्त्रियाँ हों, उनके समान (अधोक्) पूर्ण करे अर्थात् उनके समान परिपूर्ण सेना रक्खे, वही आप लोगों का राजा होवे ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जिस राजा की नदी के सदृश और शत्रुओं के नाश करनेवाली, अन्न और पान आदि से तृप्त और अपने विवर के ढाँपनेवाली पतिव्रता स्त्रियों के सदृश राजभक्त सेना होवे, वही विजय प्राप्त होने योग्य है ॥७॥
Subject
अब प्रजाओं के निमित्त राज-उपदेश को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥