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Rigveda Mandal 4 / Sukta 19 / Mantra 6

58 Sukta
11 Mantra
4/19/6
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वं म॒हीम॒वनिं॑ वि॒श्वधे॑नां तु॒र्वीत॑ये व॒य्या॑य॒ क्षर॑न्तीम्। अर॑मयो॒ नम॒सैज॒दर्णः॑ सुतर॒णाँ अ॑कृणोरिन्द्र॒ सिन्धू॑न् ॥६॥

त्वम् । म॒हीम् । अ॒वनि॑म् । वि॒श्वऽधे॑नाम् । तु॒र्वीत॑ये । व॒य्या॑य । क्षर॑न्तीम् । अर॑मयः । नम॑सा । एज॑त् । अर्णः॑ । सु॒ऽत॒र॒णान् । अ॒कृ॒णोः॒ । इ॒न्द्र॒ । सिन्धू॑न् ॥

Mantra without Swara
त्वं महीमवनिं विश्वधेनां तुर्वीतये वय्याय क्षरन्तीम्। अरमयो नमसैजदर्णः सुतरणाँ अकृणोरिन्द्र सिन्धून् ॥

त्वम्। महीम्। अवनिम्। विश्वऽधेनाम्। तुर्वीतये। वय्याय। क्षरन्तीम्। अरमयः। नमसा। एजत्। अर्णः। सुऽतरणान्। अकृणोः। इन्द्र। सिन्धून् ॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 2 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) राजन् ! (त्वम्) आप (तुर्वीतये) शत्रुओं के नाश करनेवाले के और (वय्याय) प्राप्त होने योग्य सुख के लिये (विश्वधेनाम्) सम्पूर्ण वाणी जिसके लिये उस (क्षरन्तीम्) प्राप्त कराती हुई (अवनिम्) रक्षा करनेवाली (महीम्) पृथिवी को प्राप्त होकर हम लोगों को (नमसा) अन्न आदि से (अरमयः) रमाओ और जिनमें (अर्णः) जल (एजत्) कम्पता है, उन (सिन्धून्) नदों को (सुतरणान्) सुखपूर्वक तरना जिनका ऐसे (अकृणोः) करो ॥६॥
Essence
हे राजन् ! आप जो राज्य को प्राप्त हो, आप ही आनन्दित हो हम लोगों को नहीं आनन्द देवें तो आपका आनन्द शीघ्र नष्ट हो और आप सब लोगों के सुख के लिये नदी, नद, तड़ाग और समुद्र आदिकों के पार उतरने के लिये नौका आदि बना के धनाढ्य निरन्तर करिये ॥६॥
Subject
फिर राजगुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥