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Rigveda Mandal 4 / Sukta 19 / Mantra 3

58 Sukta
11 Mantra
4/19/3
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अतृ॑प्णुवन्तं॒ विय॑तमबु॒ध्यमबु॑ध्यमानं सुषुपा॒णमि॑न्द्र। स॒प्त प्रति॑ प्र॒वत॑ आ॒शया॑न॒महिं॒ वज्रे॑ण॒ वि रि॑णा अप॒र्वन् ॥३॥

अतृ॑प्णुवन्तम् । विऽय॑तम् । अ॒बु॒ध्यम् । अबु॑ध्यमानम् । सु॒सु॒पा॒णम् । इ॒न्द्र॒ । स॒प्त । प्रति॑ । प्र॒ऽवतः॑ । आ॒शया॑नम् । अहि॑म् । वज्रे॑ण । वि । रि॒णाः॒ । अ॒प॒र्वन् ॥

Mantra without Swara
अतृप्णुवन्तं वियतमबुध्यमबुध्यमानं सुषुपाणमिन्द्र। सप्त प्रति प्रवत आशयानमहिं वज्रेण वि रिणा अपर्वन् ॥

अतृप्णुवन्तम्। विऽयतम्। अबुध्यम्। अबुध्यमानम्। सुसुपानम्। इन्द्र। सप्त। प्रति। प्रऽवतः। आऽशयानम्। अहिम्। वज्रेण। वि। रिणाः। अपर्वन् ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 1 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्ययुक्त ! आप जैसे सूर्य (वज्रेण) वज्र से (आशयानम्) सब ओर से सोते हुए (अहिम्) मेघ का नाश करके (सप्त) सात (प्रवतः) नीच के मार्गों को प्राप्त कराता है, वैसे ही (अपर्वन्) पर्व से रहित समय में (अतृप्णुवन्तम्) भोगों में नहीं तृप्त (सुषुपाणम्) उत्तम पानयुक्त (वियतम्) नहीं जितेन्द्रिय (अबुध्यम्) बुद्धि से रहित (अबुध्यमानम्) उपदेश से भी नहीं जानते हुए अधार्मिक जन की दण्ड से (प्रति, वि, रिणाः) विशेष हिंसा करें ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य किरणों से मेघ को काट के और पृथिवी पर गिरा के नाना प्रकार के मार्गों में बहाता है, वैसे ही विद्या से अविद्या का नाश करके दण्ड से अधार्मिक पुरुषों को कारगृह अर्थात् जेलखाने में छोड़ के बहुत शाखायुक्त नीति का सर्वत्र प्रचार करे ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥