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Rigveda Mandal 4 / Sukta 19 / Mantra 2

58 Sukta
11 Mantra
4/19/2
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अवा॑सृजन्त॒ जिव्र॑यो॒ न दे॒वा भुवः॑ स॒म्राळि॑न्द्र स॒त्ययो॑निः। अह॒न्नहिं॑ परि॒शया॑न॒मर्णः॒ प्र व॑र्त॒नीर॑रदो वि॒श्वधे॑नाः ॥२॥

अव॑ । अ॒सृ॒ज॒न्त॒ । जिव्र॑यः । न । दे॒वाः । भुवः॑ । स॒म्ऽराट् । इ॒न्द्र॒ । स॒त्यऽयो॑निः । अह॑न् । अहि॑म् । प॒रि॒ऽशया॑नम् । अर्णः॑ । प्र । व॒र्त॒नीः । अ॒र॒दः॒ । वि॒श्वऽधे॑नाः ॥

Mantra without Swara
अवासृजन्त जिव्रयो न देवा भुवः सम्राळिन्द्र सत्ययोनिः। अहन्नहिं परिशयानमर्णः प्र वर्तनीररदो विश्वधेनाः ॥

अव। असृजन्त। जिव्रयः। न। देवाः। भुवः। सम्ऽराट्। इन्द्र। सत्यऽयोनिः। अहन्। अहिम्। परिऽशयानम्। अर्णः। प्र। वर्तनीः। अरदः। विश्वऽधेनाः ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 1 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्ययुक्त ! आप (भुवः) पृथिवी के मध्य में (सम्राट्) उत्तम प्रकार प्रकाशमान चक्रवर्त्ती (सत्ययोनिः) नहीं नाश होनेवाला कारण वा स्थान जिसका ऐसा सूर्य्य जैसे (परिशयानम्) अन्तरिक्ष में सब ओर से शयन करनेवाले (अहिम्) मेघ का (अहन्) नाश करता है (अर्णः) जल (वर्त्तनीः) मार्गों को (प्र, अरदः) अर्थात् करोदता है, वैसे ही शत्रुओं का नाश करके विराजमान हूजिये जो (विश्वधेनाः) समस्त वाणियोंवाले (जिव्रयः) दृढजीवनों के (न) समान (देवाः) चन्द्र आदि दिव्य पदार्थों के सदृश विद्वान् जन आपको (अव, असृजन्त) उत्पन्न करते हैं, उनका तुम संग करो ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे राजन् ! आप सत्य आचरण करनेवाले हुए यथार्थ वक्ताओं के सहाय से चक्रवर्त्ती सार्वभौम हूजिये और जैसे सूर्य्य मेघ का नाश करके संसार को सुख देता है, वैसे चोर डाकुओं का नाश करके प्रजाओं को आनन्द दीजिये ॥२॥
Subject
अब मेघ दृष्टान्त से राजगुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥