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Rigveda Mandal 4 / Sukta 19 / Mantra 10

58 Sukta
11 Mantra
4/19/10
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्र ते॒ पूर्वा॑णि॒ कर॑णानि विप्रावि॒द्वाँ आ॑ह वि॒दुषे॒ करां॑सि। यथा॑यथा॒ वृष्ण्या॑नि॒ स्वगू॒र्तापां॑सि राज॒न्नर्यावि॑वेषीः ॥१०॥

प्र । ते॒ । पूर्वा॑णि । कर॑णानि । वि॒प्र॒ । आ॒ऽवि॒द्वान् । आ॒ह॒ । वि॒दुषे॑ । करां॑सि । यथा॑ऽयथा । वृष्ण्या॑नि । स्वऽगू॒र्ता । अपां॑सि । रा॒ज॒न् । नर्या॑ । अवि॑वेषीः ॥

Mantra without Swara
प्र ते पूर्वाणि करणानि विप्राविद्वाँ आह विदुषे करांसि। यथायथा वृष्ण्यानि स्वगूर्तापांसि राजन्नर्याविवेषीः ॥

प्र। ते। पूर्वाणि। करणानि। विप्र। आऽविद्वान्। आह। विदुषे। करांसि। यथाऽयथा। वृष्ण्यानि। स्वऽगूर्ता। अपांसि। राजन्। नर्या। अविवेषीः ॥१०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 2 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (विप्र) बुद्धिमान् (राजन्) राजन् ! (विदुषे) विद्वान् ! (ते) आपके लिये (यथायथा) जैसे-जैसे (पूर्वाणि) अनादि काल से सिद्ध (करणानि) जिनसे करें वह कार्य्यसाधन (करांसि) और करने योग्य कर्म्म (वृष्ण्यानि) बलकारक (स्वगूर्त्ता) अपने से प्राप्त (नर्य्या) मनुष्यों में हित करनेवाले (अपांसि) कर्म्मों को (आविद्वान्) सब प्रकार से समस्त जानता हुआ (प्र, आह) अच्छे कहता है, उनको आप (अविवेषीः) विशेष करके प्राप्त हूजिये ॥१०॥
Essence
हे विद्वन् राजन् ! आप सदा श्रेष्ठ पुरुषों की शिक्षा में प्रवृत्त हूजिये और जो-जो आपके लिये वे उपदेश देवें, वैसे ही करिये ॥१०॥
Subject
अब विद्वान् के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥