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Rigveda Mandal 4 / Sukta 18 / Mantra 9

58 Sukta
13 Mantra
4/18/9
Devata- इन्द्रादिती Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मम॑च्च॒न ते॑ मघव॒न्व्यं॑सो निविवि॒ध्वाँ अप॒ हनू॑ ज॒घान॑। अधा॒ निवि॑द्ध॒ उत्त॑रो बभू॒वाञ्छिरो॑ दा॒सस्य॒ सं पि॑णग्व॒धेन॑ ॥९॥

मम॑त् । च॒न । ते॒ । म॒घ॒ऽव॒न् । विऽअं॑सः । नि॒ऽवि॒वि॒ध्वान् । अप॑ । हनू॒ इति॑ । ज॒घान॑ । अध॑ । निऽवि॑द्धः । उत्ऽत॑रः । ब॒भू॒वान् । शिरः॑ । दा॒सस्य॑ । सम् । पि॒ण॒क् । व॒धेन॑ ॥

Mantra without Swara
ममच्चन ते मघवन्व्यंसो निविविध्वाँ अप हनू जघान। अधा निविद्ध उत्तरो बभूवाञ्छिरो दासस्य सं पिणग्वधेन ॥

ममत्। चन। ते। मघऽवन्। विऽअंसः। निऽविविध्वान्। अप। हनू इति। जघान। अध। निऽविद्धः। उत्ऽतरः। बभूवान्। शिरः। दासस्य। सम्। पिणक्। वधेन ॥९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 26 Mantra » 4

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Meaning
हे (मघवन्) बहुत धन से युक्त पुरुष जो (ते) आपके (दासस्य) देने योग्य के (वधेन) ताड़न से (शिरः) शिर को (सम्, पिणक्) अच्छे पीसता है (व्यंसः) खींच लिये गये हैं बल आदि जिसके ऐसा (निविविध्वान्) अत्यन्त शत्रुओं का नाश करनेवाला (हनू) मुख के आस-पास के भागों को (अप) दूर करने में (जघान) नाश करता है (अधा) इसके (ममत्) प्रसन्न होता हुआ (चन) भी (उत्तरः) आगे के समय में होनेवाला (निविद्धः) अत्यन्त वाणों से छेदा गया (बभूवान्) होता है, उसको आप दण्ड दीजिये ॥९॥
Essence
हे राजन् ! जो विरुद्ध कर्म से प्रजाओं में चेष्टा करता है, उस सदा दृढ़ बँधे को शस्त्रों से व्यथित कर सब प्रकार से बाँधो ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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