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Rigveda Mandal 4 / Sukta 18 / Mantra 8

58 Sukta
13 Mantra
4/18/8
Devata- इन्द्रादिती Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मम॑च्च॒न त्वा॑ युव॒तिः प॒रास॒ मम॑च्च॒न त्वा॑ कु॒षवा॑ ज॒गार॑। मम॑च्चि॒दापः॒ शिश॑वे ममृड्यु॒र्मम॑च्चि॒दिन्द्रः॒ सह॒सोद॑तिष्ठत् ॥८॥

मम॑त् । च॒न । त्वा॒ । यु॒व॒तिः । प॒रा॒ऽआस॑ । मम॑त् । च॒न । त्वा॒ । कु॒षवा॑ । ज॒गार॑ । मम॑त् । चि॒त् । आपः॑ । शिश॑वे । म॒मृ॒ड्युः॒ । मम॑त् । चि॒त् । इन्द्रः॑ । सह॑सा । उत् । अ॒ति॒ष्ठ॒त् ॥

Mantra without Swara
ममच्चन त्वा युवतिः परास ममच्चन त्वा कुषवा जगार। ममच्चिदापः शिशवे ममृड्युर्ममच्चिदिन्द्रः सहसोदतिष्ठत् ॥

ममत्। चन। त्वा। युवतिः। पराऽआस। ममत्। चन। त्वा। कुषवा। जगार। ममत्। चित्। आपः। शिशवे। ममृड्युः। ममत्। चित्। इन्द्रः। सहसा। उत्। अतिष्ठत् ॥८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 26 Mantra » 3

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Meaning
हे राजन् ! जो (युवतिः) पूर्ण चौबीस वर्षवाली (त्वा) आपको (ममत्) मदयुक्त करती हुई (चन) भी (परास) पराङ्मुख करती है, जो (ममत्) प्रमादयुक्त करती हुई (कुषवा) निकृष्ट प्रेरणावाली (त्वा) आपको (चन) भी (जगार) निगलती है, उसके सङ्ग का त्याग करो और जो (ममत्) मदयुक्त करती हुई (आपः) जलों के सदृश वर्तमान माता से (चित्) वैसे (शिशवे) पुत्र के लिये (ममृड्युः) सुख देती है और जो (ममत्) सुख देता हुआ (चित्) सा (इन्द्रः) सूर्य के सदृश (सहसा) बल से (उत्, अतिष्ठत्) उठता है, उसकी सेवा करो ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग प्रमत्त स्त्रियों में प्रमाद को नहीं प्राप्त होते, वे बली होते हैं और जो पुत्र के सदृश प्रजाओं का पालन करते, वे उत्तम होते हैं ॥८॥
Subject
अब राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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