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Rigveda Mandal 4 / Sukta 18 / Mantra 5

58 Sukta
13 Mantra
4/18/5
Devata- इन्द्रादिती Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒व॒द्यमि॑व॒ मन्य॑माना॒ गुहा॑क॒रिन्द्रं॑ मा॒ता वी॒र्ये॑णा॒ न्यृ॑ष्टम्। अथोद॑स्थात्स्व॒यमत्कं॒ वसा॑न॒ आ रोद॑सी अपृणा॒ज्जाय॑मानः ॥५॥

अ॒व॒द्यम्ऽइ॑व । मन्य॑माना । गुहा॑ । अ॒कः॒ । इन्द्र॑म् । मा॒ता । वी॒र्ये॑ण । निऽऋ॑ष्टम् । अथ॑ । उत् । अ॒स्था॒त् । स्व॒यम् । अत्क॑म् । वसा॑नः । आ । रोद॑सी॒ इति॑ । अ॒पृ॒णा॒त् । जाय॑मानः ॥

Mantra without Swara
अवद्यमिव मन्यमाना गुहाकरिन्द्रं माता वीर्येणा न्यृष्टम्। अथोदस्थात्स्वयमत्कं वसान आ रोदसी अपृणाज्जायमानः ॥

अवद्यम्ऽइव। मन्यमाना। गुहा। अकः। इन्द्रम्। माता। वीर्येण। निऽऋष्टम्। अथ। उत्। अस्थात्। स्वयम्। अत्कम्। वसानः। आ। रोदसी इति। अपृणात्। जायमानः ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 25 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे (मन्यमाना) आदर की गई (माता) माता (गुहा) बुद्धि में (वीर्येणा) पराक्रम से (न्यृष्टम्) अत्यन्त प्राप्त (इन्द्रम्) राजा को (अवद्यमिव) निन्दनीय के सदृश (अकः) करती है, वैसे ही (जायमानः) उत्पन्न होनेवाला सूर्य (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथ्वी का (आ, अपृणात्) पालन करता है और जैसे (अत्कम्) कूप का (वसानः) आच्छादन करता हुआ जन (स्वयम्) आप ही ऊपर को प्राप्त होवे, वैसे जो (उत, अस्थात्) उठता है वह (अथ) अनन्तर सब जगत् की रक्षा करता है ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो माता सूर्य के सदृश जिन अपने सन्तानों को बोध कराती और दुष्ट आचरणों को दूर करके शिक्षा करती है, तो वे सन्तान उत्तम होते हैं ॥५॥
Subject
अब मान करनेवाली माता से उत्तम ऐश्वर्यवान् पुरुष के पालनादि विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥