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Rigveda Mandal 4 / Sukta 18 / Mantra 13

58 Sukta
13 Mantra
4/18/13
Devata- इन्द्रादिती Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अव॑र्त्या॒ शुन॑ आ॒न्त्राणि॑ पेचे॒ न दे॒वेषु॑ विविदे मर्डि॒तार॑म्। अप॑श्यं जा॒यामम॑हीयमाना॒मधा॑ मे श्ये॒नो मध्वा ज॑भार ॥१३॥

अव॑र्त्या । शुनः॑ । आ॒न्त्राणि॑ । पे॒चे॒ । न । दे॒वेषु॑ । वि॒वि॒दे॒ । म॒र्डि॒तार॑म् । अप॑श्यम् । जा॒याम् । अम॑हीयमानाम् । अध॑ । मे॒ । श्ये॒नः । मधु॑ । आ । ज॒भा॒र॒ ॥

Mantra without Swara
अवर्त्या शुन आन्त्राणि पेचे न देवेषु विविदे मर्डितारम्। अपश्यं जायाममहीयमानामधा मे श्येनो मध्वा जभार ॥

अवर्त्या। शुनः। आन्त्राणि। पेचे। न। देवेषु। विविदे। मर्डितारम्। अपश्यम्। जायाम्। अमहीयमानाम्। अध। मे। श्येनः। मधु। आ। जभार ॥१३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 26 Mantra » 8

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! जो (मे) मेरी (अमहीयमानाम्) नहीं सत्कार की गई (जायाम्) स्त्री को (श्येनः) वाज पक्षी के सदृश शीघ्र चलनेवाला सब ओर से (आ, जभार) हरता है (अधा) इसके अनन्तर (शुनः) कुत्ते की (अवर्त्या) नहीं वर्त्तने योग्य (आन्त्राणि) और उठे हैं हाड़ जिनसे उन स्थूल नाड़ियों के सदृश शरीर को (पेचे) पचाता है, इससे (मर्डितारम्) सुख करनेवाले आपका मैं (अपश्यम्) दर्शन करूँ। वह जैसे (देवेषु) विद्वानों में (मधु) मधुर विज्ञान को (न) नहीं (विविदे) प्राप्त होता है, वैसे उसको निरन्तर दण्ड दीजिये ॥१३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् ! जो पुरुष और स्त्रियाँ व्यभिचार करें, उनको तीव्र दण्ड देकर नाश करो ॥१३॥ इस सूक्त में इन्द्र, मेघ, राजा और विद्वान् के कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥१३॥ यह तृतीय अष्टक में पाँचवाँ अध्याय अठारहवाँ सूक्त और छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥