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Rigveda Mandal 4 / Sukta 18 / Mantra 10

58 Sukta
13 Mantra
4/18/10
Devata- इन्द्रादिती Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
गृ॒ष्टिः स॑सूव॒ स्थवि॑रं तवा॒गाम॑नाधृ॒ष्यं वृ॑ष॒भं तुम्र॒मिन्द्र॑म्। अरी॑ळ्हं व॒त्सं च॒रथा॑य मा॒ता स्व॒यं गा॒तुं त॒न्व॑ इ॒च्छमा॑नम् ॥१०॥

गृ॒ष्टिः । सा॒सू॒व॒ । स्थवि॑रम् । त॒वा॒गाम् । अ॒ना॒धृ॒ष्यम् । वृ॒ष॒भम् । तुम्र॑म् । इन्द्र॑म् । अरी॑ळ्हम् । व॒त्सम् । च॒रथा॑य । मा॒ता । स्व॒यम् । गा॒तुम् । त॒न्वे॑ । इ॒च्छमा॑नम् ॥

Mantra without Swara
गृष्टिः ससूव स्थविरं तवागामनाधृष्यं वृषभं तुम्रमिन्द्रम्। अरीळ्हं वत्सं चरथाय माता स्वयं गातुं तन्व इच्छमानम् ॥

गृष्टिः। ससूव। स्थविरम्। तवागाम्। अनाधृष्यम्। वृषभम्। तुम्रम्। इन्द्रम्। अरीळ्हम्। वत्सम्। चरथाय। माता। स्वयम्। गातुम्। तन्वे। इच्छमानम् ॥१०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 26 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे बहुधनयुक्त राजन् ! जैसे (गृष्टिः) एक वार प्रसूता हुई गौ (माता) माता (चरथाय) चरने के लिये (वत्सम्) बछड़े के सदृश (स्थविरम्) स्थूल वा वृद्ध (तवागाम्) बल को प्राप्त (अनाधृष्यम्) प्रगल्भ (तुम्रम्) उत्तम कर्म्मों में प्रेरणा करने और (वृषभम्) बैल के सदृश बलिष्ठ (अरीळ्हम्) शत्रुओं के नाश करनेवाले (स्वयम्) आप (गातुम्) वाणी (इन्द्रम्) परमैश्वर्य्यवान् सुत की (इच्छमानम्) इच्छा करते हुए को (ससूव) उत्पन्न करती है, वैसे मैं आपके लिये पृथ्वी के राज्य का (तन्वे) विस्तार करूँ ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् ! जैसे उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त किये हुए अन्न आदि का समय पर नियमित भोजन किया गया शरीर को पुष्ट कर बल को बढ़ाय शत्रुओं का विजयनिमित्तक हो राज्य को बढ़ाता है, वैसे ही आप न्याय से हम लोगों के सुख की वृद्धि करो ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥