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Rigveda Mandal 4 / Sukta 18 / Mantra 1

58 Sukta
13 Mantra
4/18/1
Devata- इन्द्रादिती Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒यं पन्था॒ अनु॑वित्तः पुरा॒णो यतो॑ दे॒वा उ॒दजा॑यन्त॒ विश्वे॑। अत॑श्चि॒दा ज॑निषीष्ट॒ प्रवृ॑द्धो॒ मा मा॒तर॑ममु॒या पत्त॑वे कः ॥१॥

अ॒यम् । पन्थाः॑ । अनु॑ऽवित्तः । पु॒रा॒णः । यतः॑ । दे॒वाः । उ॒त्ऽअजा॑यन्त । विश्वे॑ । अतः॑ । चि॒त् । आ । ज॒नि॒षी॒ष्ट॒ । प्रऽवृ॑द्धः । मा । मा॒तर॑म् । अ॒मु॒या । पत्त॑वे । क॒रिति॑ कः ॥

Mantra without Swara
अयं पन्था अनुवित्तः पुराणो यतो देवा उदजायन्त विश्वे। अतश्चिदा जनिषीष्ट प्रवृद्धो मा मातरममुया पत्तवे कः ॥

अयम्। पन्थाः। अनुऽवित्तः। पुराणः। यतः। देवाः। उत्ऽअजायन्त। विश्वे। अतः। चित्। आ। जनिषीष्ट। प्रऽवृद्धः। मा। मातरम्। अमुया। पत्तवे। करिति कः ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 25 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यतः) जिससे (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् लोग (उदजायन्त) उत्तम होते हैं, वह (अयम्) यह (अनुवित्तः) अनुकूल प्राप्त (पुराणः) अनादि काल से सिद्ध (पन्थाः) मार्ग है, जिससे यह संसार (प्रवृद्धः) बढ़ा (जनिषीष्ट) उत्पन्न होवे (अतः) इस कारण से (चित्) भी आप (अमुया) उस उत्पत्ति से (मातरम्) माता को (पत्तवे) प्राप्त होने को (मा) मत (आ, कः) करे ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिस मार्ग से यथार्थवक्ता पुरुष जावें, उसी मार्ग से आप लोग भी चलो, जो बड़ी वृद्धि भी होवे तो भी माता का अपमान किसी को न करना चाहिये ॥१॥
Subject
अब तेरह ऋचावाले अठारहवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में उत्तम ऐश्वर्यवान् मनुष्य के लिये अच्छे मार्ग का उपदेश करते हैं ॥