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Rigveda Mandal 4 / Sukta 17 / Mantra 9

58 Sukta
21 Mantra
4/17/9
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒यं वृत॑श्चातयते समी॒चीर्य आ॒जिषु॑ म॒घवा॑ शृ॒ण्व एकः॑। अ॒यं वाजं॑ भरति॒ यं स॒नोत्य॒स्य प्रि॒यासः॑ स॒ख्ये स्या॑म ॥९॥

अ॒यम् । वृतः॑ । चा॒त॒य॒ते॒ । स॒म्ऽई॒चीः । यः । आ॒जिषु॑ । म॒घऽवा॑ । शृ॒ण्वे । एकः॑ । अ॒यम् । वाज॑म् । भ॒र॒ति॒ । यम् । स॒नोति॑ । अ॒स्य । प्रि॒यासः॑ । स॒ख्ये । स्या॒म॒ ॥

Mantra without Swara
अयं वृतश्चातयते समीचीर्य आजिषु मघवा शृण्व एकः। अयं वाजं भरति यं सनोत्यस्य प्रियासः सख्ये स्याम ॥

अयम्। वृतः। चातयते। सम्ऽईचीः। यः। आजिषु। मघऽवा। शृण्वे। एकः। अयम्। वाजम्। भरति। यम्। सनोति। अस्य। प्रियासः। सख्ये। स्याम ॥९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 22 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! (यः) जो (अयम्) यह राजा (वृतः) स्वीकार किया हुआ बोधरहितों को (चातयते) विज्ञान करता है और जो (मघवा) बहुत धनरूप ऐश्वर्य्य से युक्त (एकः) अकेला अर्थात् सहायरहित (आजिषु) संग्रामों में (समीचीः) शिक्षाओं को प्राप्त होनेवाली सेनाओं का (भरति) पोषण करता है (अयम्) और यह (वाजम्) विज्ञान को पुष्ट करता है (यम्) जिसको यथार्थवक्ता पुरुष प्राप्त कर (सनोति) संपन्न करता है, जिसको मैं (शृण्वे) सुनता हूँ (अस्य) इसके (सख्ये) मित्रकर्म्म में हम लोग (प्रियासः) प्रिय (स्याम) होवें ॥९॥
Essence
हे राजन् ! जो सेनाओं को शिक्षा दिलाता है, विशेष करके युद्ध के समय में उचित बात कहने से योद्धाजनों का उत्साह बढ़ाता है और जो जन सम्मुख आपके दोषों को कहते हैं, उनकी शिक्षा में स्थित होकर, उन्हीं जनों में मित्रता करके सम्पूर्ण कार्य्यों को सिद्ध करो ॥९॥
Subject
अब राजा को अमात्य आदि भृत्य कैसे रखने चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥