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Rigveda Mandal 4 / Sukta 17 / Mantra 7

58 Sukta
21 Mantra
4/17/7
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वमध॑ प्रथ॒मं जाय॑मा॒नोऽमे॒ विश्वा॑ अधिथा इन्द्र कृ॒ष्टीः। त्वं प्रति॑ प्र॒वत॑ आ॒शया॑न॒महिं॒ वज्रे॑ण मघव॒न्वि वृ॑श्चः ॥७॥

त्वम् । अध॑ । प्र॒थ॒मम् । जाय॑मानः । अमे॑ । विश्वाः॑ । अ॒धि॒थाः॒ । इ॒न्द्र॒ । कृ॒ष्टीः । त्वम् । प्रति॑ । प्र॒ऽवतः॑ । आ॒ऽशया॑नम् । अहि॑म् । वज्रे॑ण । म॒घ॒ऽव॒न् । वि । वृ॒श्चः॒ ॥

Mantra without Swara
त्वमध प्रथमं जायमानोऽमे विश्वा अधिथा इन्द्र कृष्टीः। त्वं प्रति प्रवत आशयानमहिं वज्रेण मघवन्वि वृश्चः ॥

त्वम्। अध। प्रथमम्। जायमानः। अमे। विश्वाः। अधिथाः। इन्द्र। कृष्टीः। त्वम्। प्रति। प्रऽवतः। आऽशयानम्। अहिम्। वज्रेण। मघऽवन्। वि। वृश्चः ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 22 Mantra » 2

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Meaning
हे (मघवन्) बहुत धन से युक्त (इन्द्र) दुष्ट पुरुषों के नाश करनेहारे राजन् ! (अमे) गृह में (जायमानः) उत्पन्न होनेवाले (त्वम्) आप (विश्वाः) सम्पूर्ण (कृष्टीः) मनुष्य आदि प्रजाओं को (प्रथमम्) पहिले (अधिथाः) धारण करो (अध) इसके अनन्तर (त्वम्) आप जैसे (प्रवतः) नीचले स्थलों के (प्रति) प्रति (आशयानम्) सब प्रकार सोते हुए के सदृश वर्त्तमान (अहिम्) मेघ को (वज्रेण) किरणों से सूर्य्य नाश करता है, वैसे ही दुष्ट पुरुषों का आप (वि, वृश्चः) नाश करो ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो पुरुष प्रथम से ब्रह्मचर्य्य, विद्या, विनय और सुशीलता से सब में उत्तम होता है और जो राज्यपालन और युद्ध करने को जानता है, उसी को राजा करके सुखी होओ ॥७॥
Subject
अब राजा के प्रति प्रजापालन प्रकार को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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