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Rigveda Mandal 4 / Sukta 17 / Mantra 3

58 Sukta
21 Mantra
4/17/3
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
भि॒नद्गि॒रिं शव॑सा॒ वज्र॑मि॒ष्णन्ना॑विष्कृण्वा॒नः स॑हसा॒न ओजः॑। वधी॑द्वृ॒त्रं वज्रे॑ण मन्दसा॒नः सर॒न्नापो॒ जव॑सा ह॒तवृ॑ष्णीः ॥३॥

भि॒नत् । गि॒रिम् । शव॑सा । वज्र॑म् । इ॒ष्णन् । आ॒विः॒ऽकृ॒ण्वा॒नः । स॒ह॒सा॒नः । ओजः॑ । वधी॑त् । वृ॒त्रम् । वज्रे॑ण । म॒न्द॒सा॒नः । सर॑न् । आपः॑ । जव॑सा । ह॒तऽवृ॑ष्णीः ॥

Mantra without Swara
भिनद्गिरिं शवसा वज्रमिष्णन्नाविष्कृण्वानः सहसान ओजः। वधीद्वृत्रं वज्रेण मन्दसानः सरन्नापो जवसा हतवृष्णीः ॥

भिनत्। गिरिम्। शवसा। वज्रम्। इष्णन्। आविःऽकृण्वानः। सहसानः। ओजः। वधीत्। वृत्रम्। वज्रेण। मन्दसानः। सरन्। आपः। जवसा। हतऽवृष्णीः ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 21 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! जैसे सूर्य (गिरिम्) पर्वत के समान मेघ को (भिनत्) विदीर्ण कर और (वज्रेण) किरण से (वृत्रम्) मेघ का (वधीत्) नाश करता है, उस नाश हुए मेघ से (हतवृष्णीः) नष्ट किया गया मेघ जिनका वह (आपः) जल (जवसा) वेग से (सरन्) जाते हैं, वैसे ही (मन्दसानः) आनन्द वा (सहसानः) सहन करते (ओजः) और पराक्रम को (आविष्कृण्वानः) प्रकट करते वा (वज्रम्) किरण के समान शस्त्र को (इष्णन्) प्राप्त होते हुए (शवसा) बल से शत्रुओं की सेना का नाश करो और सेना से शत्रुओं का नाश करके रुधिरों को बहाओ ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग सूर्य्य के सदृश न्याय से प्रकाश बल से प्रसिद्ध, दुष्टों के नाशकारक और श्रेष्ठ पुरुषों के लिये आनन्ददायक होते हैं, वे ही प्रकट यशवाले होकर इस संसार में और परलोक अर्थात् दूसरे जन्म में अखण्ड आनन्दवाले होते हैं ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥