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Rigveda Mandal 4 / Sukta 17 / Mantra 20

58 Sukta
21 Mantra
4/17/20
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒वा न॒ इन्द्रो॑ म॒घवा॑ विर॒प्शी कर॑त्स॒त्या च॑र्षणी॒धृद॑न॒र्वा। त्वं राजा॑ ज॒नुषां॑ धेह्य॒स्मे अधि॒ श्रवो॒ माहि॑नं॒ यज्ज॑रि॒त्रे ॥२०॥

ए॒व । नः॒ । इन्द्रः॑ । म॒घऽवा॑ । वि॒ऽर॒प्शी । कर॑त् । स॒त्या । च॒र्ष॒णि॒ऽधृत् । अ॒न॒र्वा । त्वम् । राजा॑ । ज॒नुषा॑म् । धे॒हि॒ । अ॒स्मे इति॑ । अधि॑ । श्रवः॑ । माहि॑नम् । यत् । ज॒रि॒त्रे ॥

Mantra without Swara
एवा न इन्द्रो मघवा विरप्शी करत्सत्या चर्षणीधृदनर्वा। त्वं राजा जनुषां धेह्यस्मे अधि श्रवो माहिनं यज्जरित्रे ॥

एव। नः। इन्द्रः। मघऽवा। विऽरप्शी। करत्। सत्या। चर्षणिऽधृत्। अनर्वा। त्वम्। राजा। जनुषाम्। धेहि। अस्मे इति। अधि। श्रवः। माहिनम्। यत्। जरित्रे ॥२०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 24 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! (यत्) जो (नः) हम लोगों के लिये (राजा) प्रकाशमान (मघवा) धनदाता (विरप्शी) बड़े (चर्षणीधृत्) मनुष्यों को धारण करनेवाले (अनर्वा) घोड़ों से रहित (इन्द्रः) राजा (त्वम्) आप (सत्या) नहीं नाश होनेवाले कार्यों को (करत्) सिद्ध करें (एवा) वही आप (जनुषाम्) जन्मवाले (अस्मे) हम लोगों के (माहिनम्) बड़े (श्रवः) श्रवण वा अन्न को (अधि, धेहि) अधिक धारण करें, इसी प्रकार (जरित्रे) स्तुति करनेवाले के लिये भी ॥२०॥
Essence
जो मनुष्य अन्याय में प्रवर्त्तमान राजा को रोकते हैं, वे सत्य के प्रचार करनेवाले होते हुए बड़े सुख को प्राप्त होते हैं ॥२०॥
Subject
अब अमात्य आदि जनों से राजा की न्याय के बीच प्रवृत्ति कराने को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥