Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 4 / Sukta 17 / Mantra 2

58 Sukta
21 Mantra
4/17/2
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तव॑ त्वि॒षो जनि॑मन्रेजत॒ द्यौरेज॒द्भूमि॑र्भि॒यसा॒ स्वस्य॑ म॒न्योः। ऋ॒घा॒यन्त॑ सु॒भ्वः१॒॑ पर्व॑तास॒ आर्द॒न्धन्वा॑नि स॒रय॑न्त॒ आपः॑ ॥२॥

तव॑ । त्वि॒षः । जनि॑मन् । रे॒ज॒त॒ । द्यौः । रेज॑त् । भूमिः॑ । भि॒यसा॑ । स्वस्य॑ । म॒न्योः । ऋ॒घा॒यन्त॑ । सु॒ऽभ्वः॑ । पर्व॑तासः । आर्द॑न् । धन्वा॑नि । स॒रय॑न्ते । आपः॑ ॥

Mantra without Swara
तव त्विषो जनिमन्रेजत द्यौरेजद्भूमिर्भियसा स्वस्य मन्योः। ऋघायन्त सुभ्वः१ पर्वतास आर्दन्धन्वानि सरयन्त आपः ॥

तव। त्विषः। जनिमन्। रेजत। द्यौः। रेजत्। भूमिः। भियसा। स्वस्य। मन्योः। ऋघायन्त। सुऽभ्वः। पर्वतासः। आर्दन्। धन्वानि। सरयन्ते। आपः ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 21 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (जनिमन्) जन्मवाले राजन् ! जिस जगदीश्वर के (त्विषः) प्रताप से (भियसा) भय से (द्यौः) अन्तरिक्ष (रेजत) कम्पित होता और (भूमिः) पृथ्वी (रेजत्) कम्पित होती वैसे (तव) आपके (स्वस्य) निज (मन्योः) क्रोध से शत्रु लोग काँपें और जैसे (सुभ्वः) उत्तम प्रकार वृष्टि जिनसे हो ऐसे (पर्वतासः) पर्वतों के सदृश ऊँचे मेघ (ऋघायन्त) बाधित होते (आर्दन्) और नाश करते हैं (आपः) जल और (धन्वानि) स्थल अर्थात् शुष्क भूमियाँ (सरयन्ते) गमन करती हैं, वैसे ही आपकी सेना और मन्त्रीजन होवें ॥२॥
Essence
हे राजन् ! आप परमेश्वर के सदृश पक्षपात का त्याग करके मनुष्यों में पिता के सदृश वर्त्ताव करो और जैसे जगदीश्वर के भय से सम्पूर्ण जगत् व्यवस्थित रहता है, वैसे ही आप के दण्ड के भय से सब जगत् भोग के लिये कल्पित हो और सूर्य जैसे मेघ को बाधा करता और जलवृष्टि से जगत् को आनन्दित करता है, वैसे ही शत्रुओं को बाधित करके सज्जनों को आनन्द दीजिये ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥