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Rigveda Mandal 4 / Sukta 17 / Mantra 18

58 Sukta
21 Mantra
4/17/18
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒खी॒य॒ताम॑वि॒ता बो॑धि॒ सखा॑ गृणा॒न इ॑न्द्र स्तुव॒ते वयो॑ धाः। व॒यं ह्या ते॑ चकृ॒मा स॒बाध॑ आ॒भिः शमी॑भिर्म॒हय॑न्त इन्द्र ॥१८॥

स॒खि॒ऽय॒ताम् । अ॒वि॒ता । बो॒धि॒ । सखा॑ । गृ॒णा॒नः । इ॒न्द्र॒ । स्तु॒व॒ते । वयः॑ । धाः॒ । व॒यम् । हि । आ । ते॒ । च॒कृ॒म । स॒ऽबाधः॑ । आ॒भिः । शमी॑भिः । म॒हय॑न्तः । इ॒न्द्र॒ ॥

Mantra without Swara
सखीयतामविता बोधि सखा गृणान इन्द्र स्तुवते वयो धाः। वयं ह्या ते चकृमा सबाध आभिः शमीभिर्महयन्त इन्द्र ॥

सखिऽयताम्। अविता। बोधि। सखा। गृणानः। इन्द्र। स्तुवते। वयः। धाः। वयम्। हि। आ। ते। चकृम। सऽबाधः। आभिः। शमीभिः। महयन्तः। इन्द्र ॥१८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 24 Mantra » 3

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Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के देनेवाले (सखीयताम्) मित्र के सदृश आचरण करते हुए पुरुषों के (सखा) मित्र (अविता) रक्षा करनेवाले (गृणानः) स्तुति करते हुए (स्तुवते) प्रशंसा करनेवाले के लिये (वयः) सुन्दर धन को (धाः) धारण कीजिये। और हे (इन्द्र) सूर्य्य के सदृश विद्या और विनय से प्रकाशित जो (वयम्) हम लोग (हि) ही (ते) आपके लिये (आभिः) इन (शमीभिः) क्रियाओं से (महयन्तः) बड़े के सदृश आचरण करते हुए (वयः) सुन्दर धन को (चकृमा) करें उनको आप (सबाधः) विलोडन के सहित वर्त्तमान होते हुए (आ, बोधि) अच्छे प्रकार जानिये ॥१८॥
Essence
हे राजन् ! यदि राज्य बढ़वाने की आप इच्छा करें तो पक्षपात का त्याग करके सब के साथ मित्र के सदृश वर्त्ताव करिये और श्रेष्ठ पुरुषों की रक्षा करते और दुष्ट पुरुषों को दण्ड देते हुए अपने तेज की प्रसिद्धि करिये ॥१८॥
Subject
अब राज्यवर्द्धन प्रकार को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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