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Rigveda Mandal 4 / Sukta 17 / Mantra 13

58 Sukta
21 Mantra
4/17/13
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
क्षि॒यन्तं॑ त्व॒मक्षि॑यन्तं कृणो॒तीय॑र्ति रे॒णुं म॒घवा॑ स॒मोह॑म्। वि॒भ॒ञ्ज॒नुर॒शनि॑माँइव॒ द्यौरु॒त स्तो॒तारं॑ म॒घवा॒ वसौ॑ धात् ॥१३॥

क्षि॒यन्त॑म् । त्व॒म् । अक्षि॑यन्तम् । कृ॒णो॒ति॒ । इय॑र्ति । रे॒णुम् । म॒घऽवा॑ । स॒म्ऽओह॑म् । वि॒ऽभ॒ञ्ज॒नुः । अ॒शनि॑मान्ऽइव । द्यौः । उ॒त । स्तो॒तार॑म् । म॒घऽवा॑ । वसौ॑ । धात् ॥

Mantra without Swara
क्षियन्तं त्वमक्षियन्तं कृणोतीयर्ति रेणुं मघवा समोहम्। विभञ्जनुरशनिमाँइव द्यौरुत स्तोतारं मघवा वसौ धात् ॥

क्षियन्तम्। त्वम्। अक्षियन्तम्। कृणोति। इयर्ति। रेणुम्। मघऽवा। सम्ऽओहम्। विऽभञ्जनुः। अशनिमान्ऽइव। द्यौः। उत। स्तोतारम्। मघऽवा। वसौ। धात् ॥१३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 23 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! जैसे (मघवा) अत्यन्त धनयुक्त पुरुष (स्तोतारम्) यज्ञ करनेवाले को (वसौ) धन में (धात्) धारण करता है, वैसे जो (द्यौः) प्रकाश के सदृश (उत) और भी (अशनिमानिव) बहुत शस्त्र और अस्त्रवाले के सदृश (विभञ्जनुः) शत्रुओं का नाश करता हुआ (मघवा) श्रेष्ठधन से युक्त पुरुष (क्षियन्तम्) निवास करते और (अक्षियन्तम्) नहीं निवास करते हुए को (कृणोति) स्वीकार करता है (समोहम्) उत्तम प्रकार से छिपे हुए (रेणुम्) अपराध को (इयर्ति) प्राप्त होता है, उसको (त्वम्) आप शिक्षा दीजिये ॥१३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् ! आप जो अपराध करे उसको दण्ड के विना मत छोड़ो और जैसे यजमान विद्वान् जन को यज्ञ में स्वीकार करके धन देके सुख देता है, वैसे ही श्रेष्ठ सभासदों को स्वीकार करके ऐश्वर्य दे सब को आनन्द दीजिये ॥१३॥
Subject
अब राजा को उत्तम और अनुत्तम का दण्ड और सत्कार करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥