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Rigveda Mandal 4 / Sukta 17 / Mantra 10

58 Sukta
21 Mantra
4/17/10
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒यं शृ॑ण्वे॒ अध॒ जय॑न्नु॒त घ्नन्न॒यमु॒त प्र कृ॑णुते यु॒धा गाः। य॒दा स॒त्यं कृ॑णु॒ते म॒न्युमिन्द्रो॒ विश्वं॑ दृ॒ळ्हं भ॑यत॒ एज॑दस्मात् ॥१०॥

अ॒यम् । शृ॒ण्वे॒ । अध॑ । जय॑न् । उ॒त । घ्नन् । अ॒यम् । उ॒त । प्र । कृ॒णु॒ते॒ । यु॒धा । गाः । य॒दा । स॒त्यम् । कृ॒णु॒ते । म॒न्युम् । इन्द्रः॑ । विश्व॑म् । दृ॒ळ्हम् । भ॒य॒ते॒ । एज॑त् । अ॒स्मा॒त् ॥

Mantra without Swara
अयं शृण्वे अध जयन्नुत घ्नन्नयमुत प्र कृणुते युधा गाः। यदा सत्यं कृणुते मन्युमिन्द्रो विश्वं दृळ्हं भयत एजदस्मात् ॥

अयम्। शृण्वे। अध। जयन्। उत। घ्नन्। अयम्। उत। प्र। कृणुते। युधा। गाः। यदा। सत्यम्। कृणुते। मन्युम्। इन्द्रः। विश्वम्। दृळ्हम्। भयते। एजत्। अस्मात् ॥१०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 22 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! उत्तम प्रकार परीक्षा करके स्वीकार किया गया (अयम्) यह जन शत्रुओं का (घ्नन्) नाश करता है और (उत) भी (युधा) युद्ध से (जयन्) शत्रुओं को पराजित करता हुआ (गाः) पृथिवी के राज्यों को (प्र, कृणुते) उत्तम प्रकार करता है (उत) और (शृण्वे) जिसको मैं राज्य करने को सुनता हूँ (यदा) जब (अयम्) यह (सत्यम्) सत्य को (कृणुते) करता है तब (विश्वम्) सब राज्य (दृळ्हम्) उत्तम प्रकार स्थिर होता है, जब यह (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्यवाला राजा (मन्युम्) क्रोध को करता है (अध) इसके अनन्तर तब (अस्मात्) इस राजा से सम्पूर्ण उत्तम प्रकार स्थिर भी राज्य (एजत्) कँपता हुआ (भयते) डरता है ॥१०॥
Essence
हे राजन् ! जिस उत्तम कीर्त्ति को आप सुनें और जो लोग राज्यपालन और युद्ध में चतुर हों, उनका स्वीकार करके सत्याचार से वर्ताव कर शान्ति से सज्जनों का अच्छे प्रकार पालन करके दुष्टजनों को निरन्तर दण्ड देवें, तभी सब जन धर्म के मार्ग का त्याग करके इधर-उधर न चलित होवें ॥१०॥
Subject
अब राजा को राज्य करने का प्रकार अगले मन्त्र में कहते हैं ॥