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Rigveda Mandal 4 / Sukta 17 / Mantra 1

58 Sukta
21 Mantra
4/17/1
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वं म॒हाँ इ॑न्द्र॒ तुभ्यं॑ ह॒ क्षा अनु॑ क्ष॒त्रं मं॒हना॑ मन्यत॒ द्यौः। त्वं वृ॒त्रं शव॑सा जघ॒न्वान्त्सृ॒जः सिन्धूँ॒रहि॑ना जग्रसा॒नान् ॥१॥

त्वम् । म॒हान् । इ॒न्द्र॒ । तुभ्य॑म् । ह॒ । क्षाः । अनु॑ । क्ष॒त्रम् । मं॒हना॑ । म॒न्य॒त॒ । द्यौः । त्वम् । वृ॒त्रम् । शव॑सा । ज॒घ॒न्वान् । सृ॒जः । सिन्धू॑न् । अहि॑ना । ज॒ग्र॒सा॒नान् ॥

Mantra without Swara
त्वं महाँ इन्द्र तुभ्यं ह क्षा अनु क्षत्रं मंहना मन्यत द्यौः। त्वं वृत्रं शवसा जघन्वान्त्सृजः सिन्धूँरहिना जग्रसानान् ॥

त्वम्। महान्। इन्द्र। तुभ्यम्। ह। क्षाः। अनु। क्षत्रम्। मंहना। मन्यत। द्यौः। त्वम्। वृत्रम्। शवसा। जघन्वान्। सृजः। सिन्धून्। अहिना। जग्रसानान् ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 21 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्य्य से युक्त राजन् ! जो (त्वम्) आप (महान्) बड़े (क्षाः) भूमियों और (क्षत्रम्) राज्य को (मंहना) महान् जैसे (द्यौः) सूर्य्य वैसे (अनु, मन्यत) मानते हो (ह) उन्हीं (तुभ्यम्) आपके लिये हम लोग भी मानते और जैसे (वृत्रम्) मेघ के सदृश वर्त्तमान शत्रु को (जघन्वान्) नाश करनेवाला (अहिना) मेघ के सदृश बड़े हुए धन से (सिन्धून्) नदियों को (सृजः) उत्पन्न करावे उसी प्रकार (त्वम्) आप (शवसा) बल से (जग्रसानान्) शत्रुसेना के अग्रणियों के समान उत्तम जनों को उत्पन्न कराओ ॥१॥
Essence
हे राजसम्बन्धी जनो ! जैसे बड़ा सूर्य वृष्टि से नदियों को पूर्ण करता है, वैसे ही धन और ऐश्वर्य्य से राज्य को शोभित करो। राजा की आज्ञा के अनुकूल वर्त्ताव करके बड़े राज्य को सम्पादन करो ॥१॥
Subject
अब इक्कीस ऋचावाले सत्रहवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्रपदवाच्य राजगुणों का वर्णन करते हैं ॥१॥