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Rigveda Mandal 4 / Sukta 16 / Mantra 7

58 Sukta
21 Mantra
4/16/7
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒पो वृ॒त्रं व॑व्रि॒वांसं॒ परा॑ह॒न्प्राव॑त्ते॒ वज्रं॑ पृथि॒वी सचे॑ताः। प्रार्णां॑सि समु॒द्रिया॑ण्यैनोः॒ पति॒र्भव॒ञ्छव॑सा शूर धृष्णो ॥७॥

अ॒पः । वृ॒त्रम् । व॒व्रि॒ऽवांस॑म् । परा॑ । अ॒ह॒न् । प्र । आ॒व॒त् । ते॒ । वज्र॑म् । पृ॒थि॒वी । सऽचे॑ताः । प्र । अर्णां॑सि । स॒मु॒द्रिया॑णि । ऐ॒नोः॒ । पतिः॑ । भव॑न् । शव॑सा । शू॒र॒ । धृ॒ष्णो॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
अपो वृत्रं वव्रिवांसं पराहन्प्रावत्ते वज्रं पृथिवी सचेताः। प्रार्णांसि समुद्रियाण्यैनोः पतिर्भवञ्छवसा शूर धृष्णो ॥

अपः। वृत्रम्। वव्रिऽवांसम्। परा। अहन्। प्र। आवत्। ते। वज्रम्। पृथिवी। सऽचेताः। प्र। अर्णांसि। समुद्रियाणि। ऐनोः। पतिः। भवन्। शवसा। शूर। धृष्णो इति ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 18 Mantra » 2

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Meaning
हे (धृष्णो) दृढ़ आत्मावाले (शूर) वीरपुरुष ! (सचेताः) चित्त के सहित वर्त्तमान (शवसा) बल से (पतिः) स्वामी (भवन्) होते हुए आप जैसे सूर्य्य (वज्रम्) किरणरूपी वज्र को फटकार (अपः) जलों को प्रकट करते (वृत्रम्) मेघ को (वव्रिवांसम्) फैल प्रकट (परा, अहन्) मारता और (समुद्रियाणि) समुद्र के योग्य (अर्णांसि) जलों की (पृथिवी) पृथिवी के सदृश (प्र, आवत्) रक्षा करता है, वैसे (ते) आपकी जो प्रजा की रक्षा करके शत्रुओं का नाश करे उसको आप (प्र, ऐनोः) प्रेरणा करो ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग सूर्य के सदृश प्रजाओं को सुख देते हैं, वे ही राजकर्म्मों में प्रेरणा करने योग्य होते हैं ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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