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Rigveda Mandal 4 / Sukta 16 / Mantra 6

58 Sukta
21 Mantra
4/16/6
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
विश्वा॑नि श॒क्रो नर्या॑णि वि॒द्वान॒पो रि॑रेच॒ सखि॑भि॒र्निका॑मैः। अश्मा॑नं चि॒द्ये बि॑भि॒दुर्वचो॑भिर्व्र॒जं गोम॑न्तमु॒शिजो॒ वि व॑व्रुः ॥६॥

विश्वा॑नि । श॒क्रः । नर्या॑णि । वि॒द्वान् । अ॒पः । रि॒रे॒च॒ । सखि॑ऽभिः । निऽका॑मैः । अश्मा॑नम् । चि॒त् । ये । बि॒भि॒दुः । वचः॑ऽभिः । व्र॒जम् । गोऽम॑न्तम् । उ॒शिजः॑ । वि । व॒व्रु॒रिति॑ वव्रुः ॥

Mantra without Swara
विश्वानि शक्रो नर्याणि विद्वानपो रिरेच सखिभिर्निकामैः। अश्मानं चिद्ये बिभिदुर्वचोभिर्व्रजं गोमन्तमुशिजो वि वव्रुः ॥

विश्वानि। शक्रः। नर्याणि। विद्वान्। अपः। रिरेच। सखिऽभिः। निऽकामैः। अश्मानम्। चित्। ये। बिभिदुः। वचःऽभिः। व्रजम्। गोऽमन्तम्। उशिजः। वि। वव्रुरिति वव्रुः ॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 18 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (ये) जो पवन (अश्मानम्) जैसे मेघ को (चित्) वैसे (बिभिदुः) विदीर्ण करते हैं (गोमन्तम्) बहुत गौओं से युक्त (व्रजम्) गौओं के स्थान की (उशिजः) कामना करते हुओं के समान न्याय को (वि, वव्रुः) अस्वीकार करते हैं, उन (निकामैः) नित्य कामनावाले (सखिभिः) मित्रों के साथ जो (शक्रः) सामर्थ्यवाला (विद्वान्) विद्वान् (विश्वानि) सम्पूर्ण (नर्याणि) मनुष्यों में उत्तम (अपः) कर्मों को (वचोभिः) वचनों से (रिरेच) पृथक् करता है, वही पृथिवी के भोगने के योग्य है ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। सूर्य्य जैसे मेघ का वैसे दुष्टों के निवारण करनेवाले वा गोपाल लोग जैसे व्रज अर्थात् गौओं के बाड़े से गौओं को वैसे अन्याय से पृथक् करनेवाले जिस पुरुष के मित्र होवें, वह मनुष्य राजा होने के योग्य है ॥६॥
Subject
फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥