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Rigveda Mandal 4 / Sukta 16 / Mantra 5

58 Sukta
21 Mantra
4/16/5
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
व॒व॒क्ष इन्द्रो॒ अमि॑तमृजी॒ष्यु१॒॑भे आ प॑प्रौ॒ रोद॑सी महि॒त्वा। अत॑श्चिदस्य महि॒मा वि रे॑च्य॒भि यो विश्वा॒ भुव॑ना ब॒भूव॑ ॥५॥

व॒व॒क्षे । इन्द्रः॑ । अमि॑तम् । ऋ॒जी॒षी । उ॒भे इति॑ । आ । प॒प्रौ॒ । रोद॑सी॒ इति॑ । म॒हि॒ऽत्वा । अतः॑ । चि॒त् । अ॒स्य॒ । म॒हि॒मा । वि । रे॒चि॒ । अ॒भि । यः । विश्वा॑ । भुव॑ना । ब॒भूव॑ ॥

Mantra without Swara
ववक्ष इन्द्रो अमितमृजीष्यु१भे आ पप्रौ रोदसी महित्वा। अतश्चिदस्य महिमा वि रेच्यभि यो विश्वा भुवना बभूव ॥

ववक्षे। इन्द्रः। अमितम्। ऋजीषी। उभे इति। आ। पप्रौ। रोदसी इति। महिऽत्वा। अतः। चित्। अस्य। महिमा। वि। रेचि। अभि। यः। विश्वा। भुवना। बभूव ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 17 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो जगदीश्वर (इन्द्रः) सूर्य्य के सदृश राजा (अभि, बभूव) हुआ जिससे (चित्) भी (अस्य) इसका (महिमा) बड़प्पन (वि, रेचि) विशेष करके शोभित होता है और जो (विश्वा) सम्पूर्ण (भुवना) भुवनों को धारण करता है (अतः) इससे (उभे) दोनों (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (महित्वा) महत्त्व से (आ, पप्रौ) व्याप्त करता है और (ऋजीषी) सरल हुआ (अमितम्) परिमाणरहित पदार्थ (ववक्षे) प्राप्त करता है, वही सब से बड़ा समझना चाहिये ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सब से जगदीश्वर का बड़प्पन अधिक जानते हैं, वे इस जगत् में प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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