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Rigveda Mandal 4 / Sukta 16 / Mantra 2

58 Sukta
21 Mantra
4/16/2
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अव॑ स्य शू॒राध्व॑नो॒ नान्ते॒ऽस्मिन्नो॑ अ॒द्य सव॑ने म॒न्दध्यै॑। शंसा॑त्यु॒क्थमु॒शने॑व वे॒धाश्चि॑कि॒तुषे॑ असु॒र्या॑य॒ मन्म॑ ॥२॥

अव॑ । स्य॒ । शू॒र॒ । अध्व॑नः । न । अन्ते॑ । अ॒स्मिन् । नः॒ । अ॒द्य । सव॑ने । म॒न्दध्यै॑ । शंसा॑ति । उ॒क्थम् । उ॒शना॑ऽइव । वे॒धाः । चि॒कि॒तुषे॑ । अ॒सु॒र्या॑य । मन्म॑ ॥

Mantra without Swara
अव स्य शूराध्वनो नान्तेऽस्मिन्नो अद्य सवने मन्दध्यै। शंसात्युक्थमुशनेव वेधाश्चिकितुषे असुर्याय मन्म ॥

अव। स्य। शूर। अध्वनः। न। अन्ते। अस्मिन्। नः। अद्य। सवने। मन्दध्यै। शंसाति। उक्थम्। उशनाऽइव। वेधाः। चिकितुषे। असुर्याय। मन्म ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 17 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शूर) शत्रुओं के नाशक ! जो (अस्मिन्) इस (सवने) क्रियाविशेषरूप यज्ञ में (अद्य) आज (मन्दध्यै) आनन्द करने को (नः) हम लोगों के (उशनेव) सदृश कामना करता हुआ (वेधाः) बुद्धिमान् जन (उक्थम्) कहने योग्य शास्त्र और (मन्म) विज्ञान को (शंसाति) प्रशंसित करे (असुर्याय) अविद्वानों में उत्पन्न अविद्वान् पुरुष के लिये (चिकितुषे) जनाने को हम लोगों के क्रियाविशेष यज्ञ में (अन्ते) समीप में प्रशंसित करे, उस (अध्वनः) मार्ग के जानेवाले को आप (न)(अव) विरोध में (स्य) अन्त को प्राप्त कराओ ॥२॥
Essence
हे राजन् ! जो बुद्धिमान् सब से विद्याओं की कामना करते हुए उपदेशक हों, उनकी निरन्तर रक्षा करो ॥२॥
Subject
फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥