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Rigveda Mandal 4 / Sukta 16 / Mantra 19

58 Sukta
21 Mantra
4/16/19
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒भिर्नृभि॑रिन्द्र त्वा॒युभि॑ष्ट्वा म॒घव॑द्भिर्मघव॒न्विश्व॑ आ॒जौ। द्यावो॒ न द्यु॒म्नैर॒भि सन्तो॑ अ॒र्यः क्ष॒पो म॑देम श॒रद॑श्च पू॒र्वीः ॥१९॥

ए॒भिः । नृऽभिः॑ । इ॒न्द्र॒ । त्वा॒युऽभिः॑ । त्वा॒ । म॒घव॑त्ऽभिः । म॒घ॒ऽव॒न् । विश्वे॑ । आ॒जौ । द्यावः॑ । न । द्यु॒म्नैः । अ॒भि । सन्तः॑ । अ॒र्यः । क्ष॒पः । म॒दे॒म॒ । श॒रदः॑ । च॒ । पू॒र्वीः ॥

Mantra without Swara
एभिर्नृभिरिन्द्र त्वायुभिष्ट्वा मघवद्भिर्मघवन्विश्व आजौ। द्यावो न द्युम्नैरभि सन्तो अर्यः क्षपो मदेम शरदश्च पूर्वीः ॥

एभिः। नृऽभिः। इन्द्र। त्वायुऽभिः। त्वा। मघवत्ऽभिः। मघऽवन्। विश्वे। आजौ। द्यावः। न। द्युम्नैः। अभि। सन्तः। अर्यः। क्षपः। मदेम। शरदः। च। पूर्वीः ॥१९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 20 Mantra » 4

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Meaning
हे (मघवन्) बहुत ऐश्वर्य्य से युक्त (इन्द्र) शत्रुओं के नाशकारक राजन् ! हम लोग (एभिः) इन पूर्वोक्त (त्वायुभिः) आपकी कामना करते हुए (मघवद्भिः) बहुत श्रेष्ठ धनों से युक्त (नृभिः) नायक मनुष्यों के साथ (विश्वे) सम्पूर्ण (आजौ) संग्राम में (द्यावः) किरणों के (न) तुल्य और (द्युम्नैः) यशरूप धन से युक्त सत्पुरुषों के साथ (त्वा) आपके आश्रय का (सन्तः) वर्ताव करते हुए (अर्य्यः) स्वामी के तुल्य (पूर्वीः) पुरानी (क्षपः) रात्रियों और (शरदः) शरद् ऋतुओं भर (च) भी (अभि, मदेम) सब ओर से आनन्द करें ॥१९॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो लोग धार्मिक शरीर और आत्मा के बल से युक्त सत्य की कामना करते हुए अपने राज्य में हुए धनयुक्त पुरुषों के साथ दृढ़ मेल कर और शत्रुओं को जीत के राज्य की प्रशंसा करते हैं, वे सूर्य्य के प्रकाश के सदृश कीर्तियुक्त और धनी होकर सब काल में आनन्दित होते हैं ॥१९॥
Subject
अब राजजन के लिये करने योग्य विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥१९॥