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Rigveda Mandal 4 / Sukta 16 / Mantra 13

58 Sukta
21 Mantra
4/16/13
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वं पिप्रुं॒ मृग॑यं शूशु॒वांस॑मृ॒जिश्व॑ने वैदथि॒नाय॑ रन्धीः। प॒ञ्चा॒शत्कृ॒ष्णा नि व॑पः स॒हस्रात्कं॒ न पुरो॑ जरि॒मा वि द॑र्दः ॥१३॥

त्वम् । पिप्रु॑म् । मृग॑यम् । शू॒शु॒ऽवांस॑म् । ऋ॒जिश्व॑ने । वै॒द॒थि॒नाय॑ । र॒न्धीः॒ । प॒ञ्चा॒शत् । कृ॒ष्णा । नि । व॒पः॒ । स॒हस्रा॑ । अत्क॑म् । न । पुरः॑ । ज॒रि॒मा । वि । द॒र्दः॒ ॥

Mantra without Swara
त्वं पिप्रुं मृगयं शूशुवांसमृजिश्वने वैदथिनाय रन्धीः। पञ्चाशत्कृष्णा नि वपः सहस्रात्कं न पुरो जरिमा वि दर्दः ॥

त्वम्। पिप्रुम्। मृगयम्। शूशुऽवांसम्। ऋजिश्वने। वैदथिनाय। रन्धीः। पञ्चाशत्। कृष्णा। नि। वपः। सहस्रा। अत्कम्। न। पुरः। जरिमा। वि। दर्दरिति दर्दः ॥१३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 19 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! (त्वम्) आप (वैदथिनाय) विज्ञानवाले के पुत्र के लिये (ऋजिश्वने) सरलता आदि गुणों से बढ़े हुए पुरुष के लिये (पिप्रुम्) व्यापक (शूशुवांसम्) बल से वृद्ध (मृगयम्) मृग को ढूँढनेवाले का (रन्धीः) नाश करो और (अत्कम्) व्याप्त होनेवाले वायु को (जरिमा) अतिवृद्ध अवस्था के (न) सदृश (पुरः) आगे (पञ्चाशत्) पचास और (सहस्रा) सहस्रों (कृष्णा) कृष्णवर्णवाले सैन्यजनों का (नि, वपः) विस्तार करो और दुष्ट पुरुषों का (वि, दर्दः) नाश करो ॥१३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । राजा आदि राजपुरुषों को चाहिये कि सेना में हजारों वीरों को रखके और नम्रता से वृद्धावस्था जैसे रूप और बलों को हरती है, वैसे ही शत्रुओं के बल को धीरे-धीरे नष्ट कर शुद्ध नीति का प्रचार करो ॥१३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥